- अपनो की उलाहना का भी हुए शिकार
किसी देश की प्रतिष्ठा खेलों में उसकी उत्कृष्टता से बहुत कुछ जुड़ी होती है, लेकिन अपने यहां यह बात कोई मायने नहीं रखती। अपने जिले को ही लें तो यहां अधिकांश युवा खेल जगत में नाम पैदा करने को पसीना बहा रहे हैं। इसमें कुछ को तो मंजिल हासिल हो जाती है, लेकिन अधिकांश प्रतिभाएं बेतरतीब ग्राउंड और जिम्मेदारों की उलाहना का शिकार होकर शिखर पर पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। इसकी जीता जागता उदाहरण गांधी स्टेडियम में हुई जनपदीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता के दौरान देखने को मिला। इसमें शामिल होने आए खिलाड़ियों को बेतरतीब और ऊबड़ खाबड़ ट्रैक पर दौड़ लगानी पड़ी। गनीमत रही कि प्रतियोगिता के दौरान किसी को कोई चोट नहीं आई। अमर उजाला ने जब इन युवा खिलाड़ियों से बातचीत की तो उन्होंने अपनी-अपनी व्यथा सुनाई।
40 किमी का सफर तय कर की प्रेक्टिस
पूरनपुर निवासी मोहम्मद खान पिछले छह माह से रोजाना 40 किमी का सफर तय करके प्रेक्टिस करने आ रहे हैं, लेकिन बृहस्पतिवार को जनपदीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में शामिल होने आए इस जुझारू युवा को महज इसलिए प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से रोक दिया क्योंकि उसके साथ उसके कॉलेज का कोई शिक्षक नहीं था। एचआरबी इंटर कॉलेज के छात्र मोहम्मद खान की आंखों में आंसू आ गए। मोहम्मद खान वर्ष 2016 में भी अपनी प्रतिभा का परचम लहरा चुके हैं। हालांकि पास खड़े कुछ शिक्षकों ने उनका हौसला बढ़ाते हुए उनकी मदद करने की बात कही। मोहम्मद खान ने बताया कि खेल तो यहां सिर्फ प्रतियोगिता के दौरान ही नजर आता है। अपनी पॉकेटमनी प्रेक्टिस करने में लगा दी, अब शामिल होने से रोक रहे हैं। ऐसे हालात में कोई खिलाड़ी कैसे आगे निकल सकेगा।
आर्थिक तंगी के चलते आगे बढ़ने में मुश्किल
एथलेटिक्स प्रतियोगिता में भाग लेने आई राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की छात्रा सुहानी प्रजापति जिले की उभरती हुई खिलाड़ी हैं। बकौल सुहानी, बचपन में बीमार अधिक होने के चलते मां बाप ने महज छह माह की उम्र में नाना-नानी को सौंप दिया। खुद को दूसरे से अलग दिखाने की चाह ने सुहानी का रूझान खेलों की तरफ कर दिया। पहले हॉकी उसके बाद एक धावक के तौर पर उसने जमकर पसीना बहाया। राज्य स्तर पर गोरखपुर, अलीगढ़ और फतेहपुर में अपना परचम लहराने वाली सुहानी ने बृहस्पतिवार को अंडर 19 की 800 दौड़ में पहला स्थान प्राप्त किया, लेकिन अपने भविष्य को लेकर सुहानी के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिखी। पूछने पर बताया कि अब तक तो नाना-नानी ने साथ दिया, लेकिन अब बड़े स्तर पर खेलने के लिए जूते, ट्रैक सूट आदि की जरूरत पड़ेगी तो यह सब कहां से आएगा?
ऊबड़ खाबड़ ट्रैक पर ही दौड़े युवा प्रतिभागी
कहने को तो गांधी स्टेडियम में तरणताल से लेकर बैडमिंटन कोर्ट तक हैं, लेकिन बृहस्पतिवार को स्टेडियम का एथलेटिक ट्रैक बेतरतीब ही दिखा। जनपदीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता के दौरान बेतरतीब मैदान को लेकर लोगबाग कानाफूसी करते दिखे। हालांकि किसी ने भी मुंह खोलने का साहस नहीं जुटाया। जनपदीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता के आयोजकों का दावा है कि प्रतियोगिता से पूर्व स्टेडियम के मैदान को चाक चौबंद कराया गया, लेकिन बृहस्पतिवार को दावे और तैयारियां खोखली ही नजर आई। प्रतियोगिता के शुरूआत में हुई अंडर 19 की 800 मीटर दौड़ में करीब 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इन प्रतिभागियों को ऊबड़ खाबड़ ट्रैक और बढ़ी घास के बीच ही दौड़ लगानी पड़ी। इसमें एक छात्रा तो बीच में ही लड़खड़ाकर गिर पड़ी। वहीं एक प्रतिभागी के पैरों के बीच फंसी पन्नी ने उसकी रफ्तार को ब्रेक लगा दिया। मैदान के हाल देख मैदान में मौजूद अन्य खिलाड़ियों ने प्रेक्टिस छोड़ पत्थरों के टुकड़े और कूड़ा करकट को हटाना मुनासिब समझा। कुल मिलाकर कुछ कर गुजरने का सपना देखने वाले युवा प्रतिभागियों ने बेतरतीब ट्रैक के गड्ढों व फैली पन्नियों के बीच ही अपनी दौड़ पूरी करनी पड़ी।
स्टेडियम में खेल हीं नहीं, साइकिल-टेंपों का भी होता है वितरण
शासन में बैठे अफसरों का ही आदेश है कि खेल स्टेडियम का प्रयोग मात्र खेल से जुड़ी गतिविधियों के लिए ही किया जाए, लेकिन ऊपर बैठे यह अफसर ही अपने खुद के बनाए आदेश की धज्जियां उड़ाते दिखते हैं। गांधी स्टेडियम में साइकिल वितरण से लेकर टेंपों वितरण तक के कार्यक्रम हो चुके हैं। खूंटा बल्ली लगाकर बड़े-बड़े पंडाल बनाए गए। हालांकि जिलास्तरीय अधिकारियों को शासनादेश की जानकारी थी, लेकिन शासन से आए एक अधिकारी के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के चलते सभी ने अपनी जुबान बंद करना ही बेहतर समझा।