पीलीभीत। पितृ पक्ष में पुरखों की आत्मा की शांति के लिए उनके तर्पण की परंपरा बरसों पुरानी है। मगर, नई पीढ़ी उस परंपरा से दूर हटने लगी है। शहर के तमाम परिवारों में नई पीढ़ी के लोगों ने अपने पुरखों का अंतिम संस्कार करने के बाद उनके अस्थि कलश (फूल) मुक्तिधाम में ही रख दिये। ये परिवार गंगा में अपने पितरों के फूल सिराने नहीं गए। जब परिवार के लोगों ने पुरखों के अस्थि कलश गंगा में नहीं सिराए तो इसके लिए कुछ समाजसेवी आगे आए। पितृ पक्ष में ही समाजसेवियों ने मुक्तिधाम में पितरों की आत्मा की शांति के लिए इकट्ठा होकर हवन और यज्ञ किया। उसके बाद 258 अस्थि कलशों को कछलाघाट ले जाकर गंगा में सिरा दिया गया।
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी अस्थियों को चिता से समेटकर गंगा में सिराने की परंपरा है। ये अस्थियां दाह संस्कार के तुरंत बाद ही चिता से बटोरकर एक कलश में रखी जाती हैं। फिर एक निश्चित समय के अंदर उन्हें गंगा में प्रवाहित किया जाता है। इसके पीछे यह मान्यता है कि ऐसा करने से पितरों की भटकती आत्मा को संसार से मुक्ति मिल जाती है। वह ईश्वर के चरणों में विलीन हो जाती है। मगर, शहर के मुक्तिधाम की एक कोठरी में सैकड़ों अस्थि कलश गंगा में प्रवाहित होने के इंतजार में रखे थे। परिवार के लोग अपने पुरखों का अंतिम संस्कार करने के बाद उनकी चिताओं से फूल चुनकर कलश में रख तो गए, मगर उन्हें समय पर ले जाकर गंगा में प्रवाहित करना भूल गए। मुक्तिधाम में 258 चिताओं के चुने हुए फूल इस इंतजार में थे कि शायद कभी कोई अपना उन्हें आकर ले जाएगा और फिर गंगा में प्रवाहित करेगा।
इस मामले को अमर उजाला ने दो सितंबर के अंक में ‘है धरा पर कोई भगीरथ...जो इन पितरों को मुक्ति दिला’ शीर्षक से खबर भी प्रमुखता से प्रकाशित की थी। अगले दिन इस खबर को संज्ञान में लेते हुए मुक्तिधाम समिति ने 31 दिसंबर 2019 तक के सभी अस्थि कलशों को अपने खर्च पर गंगा नदी में विसर्जन करने का निर्णय लिया था। पितृ पक्ष में मुक्तिधाम समिति ने पहले तो कुछ दिन इंतजार किया कि शायद कोई परिवार आकर अपने पुरखों के फूल मुक्तिधाम से ले जाए और उन्हें गंगा में सिरा दे। मगर, जब यह परिवार व्यस्त दिनचर्या में से अपने पुरखों के फूल गंगा में सिराने का समय नहीं निकाल पाए तो समाजसेवियों ने खुद ही यह बीड़ा उठाया।
मुक्तिधाम समिति के सदस्य और अन्य समाजसेवी मुक्तिधाम में शनिवार सुबह इकट्ठा हुए। पहले पितरों की आत्मा की शांति के लिए हवन और यज्ञ किया गया। उसके बाद 258 अस्थित कलशों को इकट्ठा करके वाहन से गंगा नदी के कछला घाट (बदायूं) ले जाकर उन्हें प्रवाहित कर दिया गया। अस्थि कलशों के विसर्जन में संयोजक कृष्णऔतार कंसल, अनिल कमल, मनोज पटेल, सचिन सिंह, दिनेश मिश्रा की देखरेख में हुआ। कछला घाट पर समस्त अस्थि कलशों का वेद मंत्रोच्चारण करके पूरे विधि विधान ने गंगा नदी में विसर्जित कर दिया गया। मुक्तिधाम समिति की ओर से वरिष्ठ संरक्षक भगवतसरन, अध्यक्ष सतीश जायसवाल, संजय अग्रवाल सीए, देवेश बंसल, अनिल सिंह, शिवम कश्यप समेत तमाम समाजसेवी शामिल रहे।