फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

डॉक्टर-एमआर का गठजोड़ काट रहा मरीजों की जेब

Wed, 31 Oct 2018 06:24 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,पीलीभीत
विज्ञापन
विज्ञापन
दवा कंपनी के एमआर और डॉक्टरों का गठजोड़ मरीजों की जेब काट रहा है। रोगियों को सस्ती दवाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। केंद्र सरकार ने सस्ते मूल्य पर दवा उपलब्ध कराने को हृदय रोग, कैंसर, मिर्गी समेत कई बीमारियों की दवाओं को ड्रग प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) में शामिल किया गया है। शुरूआती दौर में इससे दवा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश तो लगा, लेकिन बाद में फिर फार्मूले में बदलाव कर खेल शुरू हो गया। खेल में डॉक्टरों को भी शामिल किया गया, ताकि मनमाने दामों में दवाएं बेची जा सके।
विज्ञापन

सरकार आम लोगों के लिए दवाइयां सस्ती रखने के लिए 800 से ज्यादा दवाइयों को मूल्य नियंत्रण के दायरे में ला चुकी है। ड्रग प्राइस रेगुलेटर एनपीपीए ने दवाइयों के दाम में 4.8 फीसदी से 23.3 फीसदी तक कमी की है। इसके तहत पैरासिटामॉल, सिफोड्रोक्सिन, सेल्ब्युटामॉल व कैफेजोलिन जैसी एंटी बायोटिक्स को भी मूल्य नियंत्रण के दायरे में शामिल किया गया। इससे काफी हद तक मरीजों को राहत मिली, लेकिन यह सबकुछ ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। दवा कंपनियों ने नया तरीका ढूंढ निकाला। दवा कंपनियों ने डीपीसीओ में शामिल दवाओं के साल्ट के साथ दवा बनाने में ऐसे साल्ट इस्तेमाल करने शुरू कर दिए जो डीपीसीओ के दायरे से बाहर है। इस तरह उनकी दवा मूल्य नियंत्रण दायरे से बाहर हो गई। बाजार में एक ही फार्मूले की दवाएं अलग-अलग रेट पर उपलब्ध हैं। सस्ती दवाओं के बजाय महंगी दवाएं बाजार में पटी पड़ी हैं। कंपनी की सौदेबाजी से मरीजों की कमर टूट रही है। खासबात यह भी है कि अंजान मरीज भी वही दवा खरीदते हैं जो डॉक्टर लिखते हैं।
---------
इन दवाओं में होता है खेल
दवा सामान्य दाम फार्मूला बदलने पर बढ़े दाम
पैरासिटामॉल 1.00 रुपये 5.00 रुपये
सिफेकज्मि 7.00 रुपये 14.00 रुपये
सेलब्युटामॉल 9.00 रुपये 55.00 रुपये
सेट्राजिन 0.75 पैसे 7.00 रुपये
मेट्राजिल 7.00 रुपये 38.00 रुपये
--------
क्या है गठजोड़
दवाओं के जानकारों की मानें तो कंपनियां सीधे डॉक्टर और नर्सिंग होम से या फिर मीडिएटर के माध्यम से दवाएं लिखाने का काम करती हैं। यदि कोई दवा 100 रुपये की है तो उसमें 40-50 प्रतिशत कमीशन डॉक्टर के हिस्से में आ जाता है, 20 फीसदी मीडिएटर लेता है। 13 प्रतिशत दवा बेचने वाले मेडिकल स्टोर संचालक की जेब में जाता है। ऐसे में सवाल उठता है जब इतने बड़े हिस्से का बंदबांट हो जाता है तो फिर दवा का क्या हाल होता होगा।
विज्ञापन

---------
सरकारी डाक्टर भी शामिल हैं गठजोड़
सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों को बाहरी दवाएं लिखने पर रोक लगी है। अब जब डाक्टर बाहरी दवाएं नहीं लिख सकते है तो उनके पास मेडिकल रिप्रजेंटेटिव का क्या काम। लेकिन जिले के सरकारी अस्पतालों में ओपीडी के दौरान अक्सर एमआर बैठे देखे जा सकते हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि डॉक्टर बाहरी दवाएं लिख रहे हैं।
-------
एक दिन में होता है साढ़े छह लाख का कारोबार
जिले में करीब 1300 खुदरा मेडिकल स्टोर हैं। इन स्टारों के कारोबार का आकलन करें तो एक दिन में एक मेडिकल स्टोर पर कम से कम 50 लोग दवा लेते आते हैं। औसतन 500 रुपये की दवा खरीदी गई तो जिले के 1300 मेडिकल स्टोर पर एक दिन में दवा का कारोबार साढ़े छह लाख रुपये का होगा।
---------
दवाएं अब नियंत्रण दायरें में शामिल
डीपीसीओ में शामिल दवाएं आम लोगों के लिए काफी हितकारी हैं। अब दवाईयों के रेट काफी हद तक नियंत्रण में हैं। कांबिनेशन वाली दवाएं बाजार में लगभग खत्म हो चुकी है। कुछ दवाईयों जो स्टॉक में रखी हुई है उनको सरकार की नई नीति के तहत वापस किया जा रहा है। करीब चार सौ नई दवाईयों मर्केट में जल्द आएंगी।
- राघवेंद्र नाथ मिश्रा, कैमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन
--------
बाहरी दवाएं लिखने व एमआर पर है पाबंदी
जिला अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा बाहरी दवाएं लिखने व मेडिकल रिप्रेंजेटेटिवस के आने पर पूरी तरह से पाबंदी है। इस तरह की कोई शिकायत मेरे संज्ञान में भी नहीं है। मरीजों को वहीं दवाएं लिखी जाती हैं जो अस्पताल में उपलब्ध हैं।
विज्ञापन

-डॉ. रतनपाल सिंह सुमन, सीएमएस, जिला अस्पताल
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें