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गोशाला की तस्वीर बदलने आए जिम्मेदार कर गए खुद का उद्धार

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गोशाला की तस्वीर बदलने आए जिम्मेदार, कर गए खुद का उद्धार
घोटाले के आरोपी पूर्व प्रबंधक ने भेजे गए नोटिस का भी नहीं दिया जवाब
गोप्रेमी जनप्रतिनिधियों की सरकार में भी नहीं हो पा रहा गोशाला का रजिस्ट्रेशन
सर्वेश कुमार शर्मा
पीलीभीत। प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ और जिले की सांसद मेनका गांधी गोप्रेम/पशु प्रेमी होने से गोवंशीय पशुओं की बदहाली दूर होने की आस जागी थी। अफसोस यह कि सूबे में डेढ़ साल के कार्यकाल के दौरान दावे तो बहुत हुए पर हकीकत वही पुरानी है। इतना जरूर हुआ कि एसपीसीए द्वारा 22 साल पूर्व स्थापित कराई गई देवीपुरा गोशाला की तस्वीर बदलने के लिए जो लोग आगे आए, वह खुद का उद्धार करने से नहीं चूके। गोशाला के खाते में आए धन और उसकी निकासी को देखते हुए तो यही तस्वीर उजागर हो रही है। यही नहीं घोटाले में पूर्व में प्रबंधक रह चुके केंद्रीय मंत्री के करीबी को दो बार नोटिस भी भेजे गए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका। इसी वजह से संबंधित पर कानूनी कार्रवाई अब तक नहीं की जा सकी है।
केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने पशु प्रेम दिखाते हुए 1996 में पशुओं की सुविधाओं को देवीपुरा में एक गोशाला का निर्माण कराया था। इसमें घायल पशुओं के उपचार से लेकर रहने तक की सुविधा उपलब्ध कराई गई। हालात तब और ज्यादा बदतर हो गए जब प्रशासक बनाए गए व्यक्ति ने गोशाला को मिले सरकारी धन के अलावा चंदे में जमा की गई धनराशि का ही बंदरबांट कर डाला। नतीजतन पशुओं को चारा से लेकर इलाज को दवाएं भी मुकम्मल नहीं हो पा रही हैं। ऐसा नहीं कि इसकी जानकारी प्रशासनिक अमले को नहीं रही। सिर्फ घपला करने वाले का केंद्रीय मंत्री का करीबी होना अफसरों के हाथ बांध गया। वह गोशाला के कर्मचारियों पर भी रौब गांठने से पीछे नहीं हटा। इसका नतीजा यह रहा कि गोशाला बद से बदतर हो गई। इलाज अभाव और भूख के चलते पशुओं का दम तोड़ना मजबूरी बन गया।
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2006 के बाद नहीं हो सका पंजीकरण का नवीनीकरण
गोशाला में पशुओं की मौत की जानकारी मिलने पर हिंदू संगठनों ने विरोध किया। कई बार हंगामा भी हुआ। 2006 में गोशाला के रजिस्ट्रेशन की अवधि भी समाप्त हो गई। इसका नवीनीकरण करने के बजाय खाते में जमा धन प्रशासक डकारने में लगे रहे। नवीनीकरण न हो पाने के कारण गोशाला की देखरेख लगभग बंद हो गई। प्रशासक को न तो पशुओं के इलाज की परवाह थी और न ही चारे की चिंता। किसी तरह गोशाला के कर्मचारी व्यवस्था कर पशुओं को पालते रहे।
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2015 में हुआ था सोसायटी का गठन
15 जनवरी 2015 को शासन ने सोसायटी फॉॅर द्विवेशन ऑफ एनीमल का गठन किया। जिसमें अध्यक्ष डीएम, उपाध्यक्ष एसपी, वनाधिकारी व ईओ सदस्य, सीवीओ सचिव, एसीवीओ सदस्य के अलावा सांसद व विधायकों को शामिल किया था। इसके बाद भी गोशाला में कोई सुधार नही हुआ। नतीजतन प्रमुख सचिव डॉ. सुधीर एम बोबड़े ने 20 मार्च 2017 को इसे निरस्त कर दिया। इसमें सिर्फ अधिकारी को रखने का आदेश था। इसके बाद भी कोई देखरेख नहीं हुई।
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तत्कालीन डीएम शीतल वर्मा भेज चुकीं है समिति गठन को प्रस्ताव
30 जून 2017 को तत्कालीन डीएम शीतल वर्मा ने शासन को समिति गठन के लिए प्रस्ताव भेजा था। इसमें निरुपमा शर्मा, प्रदीप मिश्रा, देवेंद्र सिंह, डालचंद, संजीव कुमार, जानकी प्रसाद शामिल हैं। अनुमोदन के लिए प्रस्ताव तो भेज दिया गया लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। इससे अभी भी देवीपुरा गोशाला लावारिस की तरह है। हालांकि इस जिम्मा सीवीओ व सदर तहसीलदार को दे दिया गया है। पशुओं की संख्या भी काफी कम रह गई है।
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21 की जगह सिर्फ चार कर्मचारी बचे
गोशाला में पशुओं की देखरेख को लेकर 21 कर्मचारियों की नियुक्ति की गई। इनको मानदेय के रुप में एक लाख पांच हजार रुपये दिया जाता था। पशुओं के संख्या भी चार से पांच सौ तक रहा करती थी। अब आलम यह कि 21 की जगह सिर्फ चार कर्मचारी बचे हैं और पशुुओं की संख्या सिर्फ 32 है। ऐसे में गोशाला के हालात क्या हैं यह किसी से छिपा नहीं है।
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प्रबंधक को दो बार भेज चुके है नोटिस, अभी तक जवाब नहीं मिला
गोशाला के पंजीकरण के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेज दिया गया है। पशुओं की देखरेख में कोई समस्या नहीं है। उनके चारे आदि के लिए खाते में पर्याप्त धनराशि मौजूद है। तत्कालीन प्रबंधक को दो बार नोटिस जारी किया जा चुका है। अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। इसकी जानकारी उच्चाधिकारी को दे दी गई। - ज्ञान प्रकाश सिंह, अध्यक्ष/सीवीओ
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