पिछली सरकार ने श्रेय लेने को आनन फानन में घोषित करा लिया पीटीआर
जंगलों पर निर्भर परिवारों का छिन गया दाना पानी
अब जानें गंवाकर चुकानी पड़ रही कीमत
माधोटांडा (पीलीभीत)। जिले के वन क्षेत्र को टाइगर रिजर्व घोषित करने के पीछे जंगलों से सटी ग्राम पंचायतों के ग्रामीणों समेत प्रशासनिक आला अफसरों का खासा योगदान रहा। ग्राम प्रधानों व ग्रामीणों से लोक लुभावनी घोषणाएं व ख्वाब दिखाकर उनसे टाइगर रिजर्व घोषित कराने के सहमति प्रस्ताव पर हस्ताक्षर व अंगूठे भी लगवा लिए और टाइगर रिजर्व भी घोषित हो गया, लेकिन टाइगर रिजर्व प्रशासन वादे के मुताबिक जंगलों से सटी आबादी के लिए खरा नहीं उतरा। इनके जंगलों से मिलने वाले हक हकूक तो खत्म कर दिए गए और अब बाघों के हमलों से जान गंवाकर भी उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।
जल्दबाजी में लहलहाती फसलें भी कोर एरिया में दिखा दी गईं
पीलीभीत के जंगल को टाइगर रिजर्व घोषित कराने को बसपा सरकार ने भी अपने कार्यकाल में दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन सपा सरकार में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने टाइगर रिजर्व का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा। केंद्र सरकार ने प्रस्ताव पर आपत्तियां लगाकर प्रदेश सरकार को वापस भेज दिया। आपत्ति यह लगाई कि पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) बनने से पूर्व जंगलों से सटे गांवों के लोगों से रायशुमारी नहीं की गई। प्रस्ताव वापस आने पर पहले तो वन महकमे ने प्रयास किए लेकिन सफलता नहीं मिली। मामला जनप्रतिनिधियों के संज्ञान में आने के बाद प्रशासन का सहयोग लिया गया। प्रशासन का चाबुक ग्राम प्रधानों पर खासा असरदार साबित हुआ और एसडीएम की मौजूदगी में ग्राम पंचायतों की कथित तौर पर खुली बैठकें दिखा कर जंगल के किनारे के गांवों के प्रधानों से उनके हस्ताक्षर व अंगूठा लगवाकर प्रस्ताव आनन फानन में शासन को भेज दिया गया। तत्कालीन सपा सरकार अपने कार्यकाल में ही प्रोजेक्ट लागू करना चाहती थी। इस कारण कोर व बफर जोन का एरिया भी जल्दबाजी में चिह्नित किए गए। जहां खेती हो रही है वह रकवा भी कोर जोन में शामिल दिखा दिया और टाइगर प्रोजेक्ट घोषित कर दिया गया।
पीटीआर की घोषणा होते ही अधिकारों पर चला हथौड़ा
जहां टाइगर रिजर्व बनने से बुद्धिजीवी वर्ग व जनप्रतिनिधि काफी खुश दिखे कि अब जंगल में बाघों व वन्यजीवों की संख्या बढ़ेगी और देश विदेश में नाम होगा, वहीं इससे अलग जंगल से सटी आबादी के लोगों के परंपरागत अधिकारों पर हथौड़ा चलने लगा। वन महकमे ने जंगलों से जनता को मिलने वाले सारे हक हकूक बंद कर दिए। जंगलों में लोगों की आवाजाही पर भी रोक लगा दी गई। आबादी के साथ-साथ इसका खामियाजा प्रशासन का साथ देने वाले ग्राम प्रधानों को भुगतना पड़ा। सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले कई ग्राम प्रधानों को अगले चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा।
पीटीआर बनते ही जंगलों से गौण उपज की नीलामी हुई बंद
जंगलों से सटे इलाकों के लोगों को जंगल किनारे अपने मवेशी चराने, छप्पर बनाने को घासफूस, जलौनी लकड़ी लाने व जंगलों से रोजगार करने की छूट थी। गौण उपज जिसमें घासफूस, मछली, खस (इत्र बनाने वाली घास) समेत कई चीजों की वन महकमा नीलामी करता था, वह सब रोक दिया गया। देखते-देखते जंगल से सटी आबादी के जंगल में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। प्रस्ताव पर हस्ताक्षर के समय यह कहा गया था कि गांव में राशन कोटे की तरह जलौनी लकड़ी की सरकारी दुकानें खोली जाएंगी। सस्ती दरों पर जलौनी लकड़ी वन निगम देगा, लेकिन यह सभी वादे बाद में महज थोथी घोषणाएं ही साबित हुए।
वन विभाग ने गैस कनेक्शन दिलाने में किया सहयोग
जंगल से सटी आबादी जंगलों पर आश्रित न रहे, इसको लेकर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने वनों से सटे गांवों में सब्सिडी पर गैस सिलेंडर दिलवाए, लेकिन यह सभी पात्रों को को नहीं मिल सके। सस्ते दरों की लकड़ी की दुकानें भी नहीं खोली गईं। मजबूरी में यदि कोई जंगल से लकड़ी बीनकर ले भी आता तो उसे वनकर्मियों की पिटाई झेलनी पड़ती। कभी-कभी बाघ के हमले का भी उन्हें शिकार होना पड़ता। मुआवजे के नाम पर वन महकमे ने यह कहकर हाथ खींच लिए कि बाघ ने जंगल के भीतर मारा है, इसका कोई मुआवजा नहीं मिल सकता।
नेपाल सरकार 15 दिन के लिए जनता के लिए खोलती है सेंच्युरी
इंडो-नेपाल सीमा से सटी नेपाल की शुक्ला फांटा सेंच्युरी है। जहां मानव का प्रवेश वर्जित है, लेकिन वर्ष में 15 दिन के लिए नेपाल सरकार अपने नागरिकों के लिए सेच्युरी के दरवाजे खोल देती है। ताकि लोगबाग घास फूस व जलौनी लकड़ी आदि ला सकें। नेपाल का वन महकमा जंगल में जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक पर्ची देता है, लेकिन अपने जिले में वन महकमे ने पूरी तरह से अपने हाथ पीछे खींच लिए। यहां तक कि गांवों से सटे इलाकों तक के जंगलों को कोर एरिया घोषित कर दिया गया।
प्रचार-प्रसार में लगातार होती जा रही कमी
टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद भी अभी तक यहां डायरेक्टर तक की तैनाती नहीं हो सकी है। जंगलों से सटे गांवों में वन्य जीव से प्रेम बढ़ाने व वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर प्रचार-प्रसार में लगातार कमी आती जा रही है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ भी अब पहले जैसा प्रचार प्रसार नहीं करता है और न ही जंगलों से सटे युवाओं के लिए रोजगार के साधन बढ़ाए जा रहे हैं। यही वजह है कि लग्गाभग्गा, रमनगरा आद क्षेत्र में लोगों का जलौनी लकड़ी व घासफूस लाने का सिलसिला जारी है।
गांवों से सटा इलाका भी कोर जोन बना दिया
टाइगर रिजर्व बनने से पूर्व हस्ताक्षर तो प्रशासन के आदेश पर कर दिए थे, लेकिन वन विभाग ने कहा था कि गांवों से सटे जंगल बफर जोन में ही रखे जाएंगे। ग्रामीण वहां जाकर जलौनी लकड़ी व घासफूस ला सकेंगे, लेकिन लोगों को गुमराह कर सब इलाका कोर जोन घोषित कर दिया गया।
शंकर राय, पूर्व प्रधान, गभिया सहराई
महकमा किए वादों पर करे अमल
प्रशासन व वन विभाग ने बैठकों में हस्ताक्षर कराते व अंगूठा लगवाते समय अधिकांश प्रधानों को सिर्फ इतना बताया था कि इससे जंगल के आसपास के गांवों में विकास होगा। कुछ लोगों को रोजगार मिलेगा। जो वादे किए थे उस पर अमल करना चाहिए। आबादी से सटे इलाकों को बफर जोन में रखना चाहिए, ताकि जनता को भी उसका लाभ मिले और वन्यजीव बाहर निकलकर कृषि फसलों को बर्बाद न करें इसके ठोस उपाय करना चाहिए।
सुखदीप सिंह लाडी, प्रधान, बराही
टाइगर रिजर्व बनने से कुछ दिक्कतें महसूस होना स्वाभाविक हैं। लेकिन इससे जिले का नाम रोशन होगा ही, साथ ही आने वाले समय में रोजगार का दायरा भी बढ़ेगा। वन्यजीव जंगल से बाहर न निकले, इसको लेकर तार फेंसिंग भी कराई जा रही है। जिसमें सांसद व विधायकों का सहयोग लिया जा रहा है।
अनिल शाह, वन क्षेत्राधिकारी