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जंगल में ग्रास लैंड की कमी बन रही बाघों के जंगल से बाहर आने का कारण

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ग्रास लैंड की कमी बन रही बाघों के जंगल से बाहर आने का कारण
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शिकार की तलाश में बाहर निकल इंसानों को बना रहे निवाला
क्रासर...
नरभक्षी घोषित करना दूर, चिन्हित तक नहीं हो सके हमला करने वाले बाघ
अमर उजाला ब्यूरो
माधोटांडा। जिन वन क्षेत्र में ग्रासलैंड कम हैं, उन इलाकों में बाघ जंगलों से बाहर अधिक निकल रहे हैं और इंसानों पर हमला कर उन्हें निवाला बना रहे हैं। ऐसे में वन्यजीव विशेषज्ञों को समय रहते बाघों को जंगल से बाहर आने से रोकने के पुख्ता इंतजाम तलाशना मजबूरी बनती जा रही है। यदि जल्द ही इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में बाघों की बढ़ रही संख्या को देखते हुए मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में तेजी से इजाफा होने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
टाइगर रिजर्व के जंगल में जहां बाघों की संख्या बढ़ रही है वहीं तृणभोजी वन्य जीव सहित अन्य वन्य जीवों की संख्या में भी खासा इजाफा हो रहा है। पिछले दो वर्षों से बाघों के हमले भी काफी तेजी से बढ़ गए हैं। जिले में सवा साल के भीतर अब तक 22 लोग बाघों को निवाला बन चुके हैं। इधर अक्सर ऐसे मामले सामने आ रहे हैं कि जिन वन क्षेत्र के जंगल में ग्रासलैंड कम हैं, उन इलाकों के ही ज्यादातर बाघ बाहर निकल रहे हैं। वन महकमे के जिम्मेदार अधिकारी बताते है कि अधिक ग्रास लैंड वाले क्षेत्रों में तृण भोजी वन्य जीव झुंडों में देखे जाते हैं और बाघ ऐसे ही इलाकों में अपना शिकार आसानी से ढूंढ़ लेते हैं। वहीं दूसरी ओर जिन इलाकों में ग्रासलैंड कम हैं, वहां तृणभोजी वन्य जीव आसानी से हाथ नहीं आते, उन इलाकों में उनकी संख्या भी कम होती है। बताते हैं कि जब बाघ भोजन की तलाश में निकलते हैं तो नील गाय, जंगली सुअर आदि वन्यजीव अपनी जान बचाने को जंगल सीमा से सटे खेतों में जा पहुंचते हैं। भोजन की तलाश में बाघ भी वन्यजीवों का पीछा करते हुए जंगल से बाहर निकल आते हैं और शिकार के इंतजार में गन्ने के खेतों में ही शरण ले लेते हैं। इन सबके बीच इंसानों की आमद होने से बाघ आने वाले खतरे को भांपकर उन पर हमले कर रहे हैं। इन दिनों ग्रासलैंड की पुरानी घास का कटान कर किया जाता है, ताकि हरा चारा हो और तृणभोजी वन्य जीवों को आसानी से अपने क्षेत्र में ही भोजन मिल सके।
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नरभक्षी घोषित करना दूर, चिह्नित तक नहीं होते बाघ
पिछले सवा साल में बाघ 22 लोगों को अपना शिकार बना चुके हैं। हर घटना के बाद टाइगर रिजर्व प्रशासन व सामाजिक वानिकी बाघों को चिह्नित कर पकड़ने की कवायद में जुटता है। कभी हाथियों का इसमें इस्तेमाल किया जाता है तो कभी पिंजरे और कैमरे भी लगाए जाते हैं। वन विभाग की टीम भी लोकेशन ट्रेस करने को खेतों में में घूमती है, लेकिन अब तक के यह सारे प्रयास असफल ही रहे हैं। वन महकमा इंसानों के लिए खतरा बन रहे बाघ को अब तक नरभक्षी घोषित कर मारना तो दूर उन्हें चिह्नित तक नहीं कर सका है।
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...तो रेस्क्यू सेंटर भी साबित होता मददगार
टाइगर रिजर्व से जुड़े आला अफसरों ने, जिसमें वनसंरक्षक बरेली वृत वीके सिंह भी शामिल हैं, पहले यहां टाइगर सफारी बनाने के प्रयासों की पहल की, लेकिन इसमें प्रदेश व केंद्र सरकार के रोड़ा अटकाने पर टाइगर रिजर्व में रेस्क्यू सेंटर खोलने की पुरजोर पैरवी की है। शासन ने इसके लिए अपनी स्वीकृत भी दे दी है, लेकिन मामला फिर ठंडा पड़ गया है। रेस्क्यू सेंटर की स्थापना से कम से कम इतना फायदा तो हो ही जाता कि यदि कोई बाघ इंसानों पर लगातार हमला करता है तो उसे नरभक्षी होने से रोकने के लिए चिह्नित कर रेस्क्यू सेंटर में रख लिया जाता, लेकिन सरकार ने इसमें भी कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।
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वर्जन:
जिन जंगल क्षेत्रों में ग्रास लैंड अधिक हैं, उन इलाकों के बाघ बाहर नहीं निकल रहे हैं। जहां ग्रास लैंड कम हैं वहां के बाघ शिकार का पीछा करते हुए मैदानी इलाकों में आ रहे हैं। फिलहाल जंगल में लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध है। जंगल से सटे इलाके में खेती करने वाले किसान भी समूह में ही जाएं।
अनिल शाह, वन क्षेत्राधिकारी
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