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साहब ! बरसात में ये जर्जर इमारतें न बरपा दें कहर

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पीलीभीत। एक इमारत की नियमानुसार 50 से 60 वर्ष उम्र होती है, लेकिन शहर में तो सौ साल पहले बनी भी दर्जनों इमारतें हैं। मुंबई में सौ साल पुरानी इमारत ढहने से 10 से ज्यादा लोगों की जान जाने के बावजूद यहां का प्रशासन सबक लेने को तैयार नहीं है। शहर में कई पुरानी इमारतें जर्जर हो चुकी हैं। यह कब हादसे का सबब बन जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता। कई जर्जर इमारतों में तो सरकारी कार्यालय चल रहे हैं। यहां अफसर से लेकर कर्मचारियों के अलावा दिन भर काम से आने वाले लोगों की भीड़ लगी रहती है। ऐसे में उनकी जान पर खतरा मंडरा रहा है। बरसात का मौसम आने के बाद इन इमारतों के ढहने का डर भी बढ़ा है। शहर को पहचान देने वाली ऐतिहासिक इमारतें भी खस्ताहाल हो चुकी हैं। जिन पर किसी का कोई ध्यान नहीं है। अधिकारी, जनप्रतिनिधि कोई इनके प्रति संजीदा नहीं दिखता। अमर उजाला ने बुधवार को शहर की ऐसी कई इमारतों का बारीकी से हाल जाना, पेश है रिपोर्ट...।
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मूलचंद धर्मशाला
वर्ष 1941 में बनी मूलचंद धर्मशाला की बात करें तो सर्दी और बारिश के समय में गरीबों को आश्रय देने के लिए यहां पर रैन बसेरा बनाया जाता है। यहां पर अफसर भी तैयारियां परखने के लिए पहुंचते हैं। यह दावा किया जाता है कि यहां पर शिफ्ट किए जाने वाले लोग पूरी तरह से सुरक्षित हैं। अफसोस इन अधिकारियों को इस धर्मशाला की जर्जर हालत नहीं दिखती।

सूचना कार्यालय
गांधी स्टेडियम रोड स्थित जिला सूचना कार्यालय की बदहाली भी किसी से छिपी नहीं। जरा सी बारिश में कार्यालय के अंदर से लेकर बाहर तक जलभराव हो जाता है। अधिकारी से लेकर कर्मचारी परेशानी उठाते है। कार्यालय शिफ्ट करने को लेकर कई बार प्रशासन को लिखा गया, लेकिन बदहाली दूर नहीं हुई।
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बरेली गेट
शहर के जेपी रोड बाजार के बीच बना बरेली गेट दशकों से जिले को पहचान दे रहा है। यह काफी जर्जर और बदहाल हो चुका है। जगह-जगह से ईंटें निकल चुकी हैं। इसके पास बसे व्यापारियों को आए दिन खासकर बारिश के समय उसके ढहने का डर सताता रहता है। कई बार उसके सुधार की मांग भी हुई, लेकिन बयानबाजी से ज्यादा काम नहीं हो सका।

चकबंदी कार्यालय
पुरानी तहसील के नाम से मशहूर चकबंदी कार्यालय की इमारत को देखकर उसकी बदहाली का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां पर काम करने वाले कर्मचारी हों या फिर पहुंचने वाले शहरी और ग्रामीण। सभी ज्यादा देर ठहरने के बाद इस इमारत की जर्जर दशा पर चर्चा करने को मजबूर हो जाते हैं। जगह-जगह दीवारों पर पड़ी दरारों को देख उनकी धड़कन बढ़ी रहती है।

इनकी सुनें...
शहर में जर्जर बिल्डिंग कभी भी हादसे का सबब बन सकतीं हैं। प्रशासन को इसकी जांच करानी चाहिए। इस तरह की कई घटनाएं अन्य शहरों में हो भी चुकी है। प्रशासन की लापरवाही कभी भी बड़े हादसे को दावत दे सकती है।
- विनीत अग्रवाल, व्यापारी नेता

शहर की पुरानी धरोहर जर्जर हालत में है तो प्रशासन को चाहिए कि उनकी मरम्मत कराए। जिससे पुरानी धरोहर बरकरार रहे। समाज के सहयोग की अगर बात है तो इसमें मेरा पूरा सहयोग रहेगा।
- प्रदीप तिवारी

ज्यादातर इमारतें पुरातत्व विभाग के अधीन हैं। उनके आगरा कार्यालय को पत्र भेजा जा चुका है। छिटपुट रिपेयरिंग नगर पालिका की तरफ से समय-समय कराई जाती रहती है।
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-निशा मिश्रा, ईओ नगर पालिका
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