फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मेहनत व लगन से नेत्रहीन सलीम ने भरी हौंसले की उड़ान

विज्ञापन
विज्ञापन
मेहनत व लगन से नेत्रहीन सलीम ने भरी हौंसले की उड़ान
विज्ञापन

तमाम झंझावतों के बीच मार्गदर्शक का दामन थाम किया स्नातक
क्रासर...
बतौर मेडिकल रिप्रेंजटेटिव कर रहे जॉब
क्रासर...
जिले में दृष्टिबाधित बच्चों के लिए खोलना चाहते हैं स्कूल
14 पीबीटीपी 14
सुनील यादव
पीलीभीत। दिल में अगर कुछ कर गुजरने की चाहत हो तो शारीरिक अक्षमता कोई मायने नहीं रखती। यह साबित कर दिखाया दियूरी गांव के 22 वर्षीय नेत्रहीन मोहम्मद सलीम ने। सलीम को कुदरत ने भले ही कुछ नेमतें कम दी, लेकिन जिंदगी में कुछ कर गुजरने की चाहत ने उन्हें वह मुकाम दिला दिया, जिसका वह सपना देखा करते थे। गरीब परिवार से ताल्लुके रखने वाले सलीम ने कई झंझावतों के बीच स्नातक तक पढ़ाई की और वह एक फार्मा कंपनी में बतौर मेडिकल रिप्रेंजटेटिव काम कर रहे हैं।
00
एक्सीलरेटेड लर्निंग कैंप व मार्गदर्शक राकेश ने दिखाई राह
गांव दियूरी निवासी सलीम के पिता मोहम्मद तौफीक मेहनत मजदूरी करते हैं। मां बिस्मिल्लाह की दो साल पहले इंतकाल हो चुका है। सात भाई बहनों में दूसरे नंबर के मोहम्मद सलीम को बचपन से ही पढ़ाई का शौक था। बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2005-06 में दृष्टिबाधित व मूकबधिर बच्चों के ब्रिज कोर्स की शुरूआत की गई तो सर्व शिक्षा अभियान के डिस्ट्रिक कोआर्डिनेटर राकेश पटेल को विशेष बच्चे ढूंढने की जिम्मेदारी दी गई। इस बीच डीसी राकेश सलीम के घर पहुंचे और उनके पिता से सलीम का दाखिल करवाने की बात कही, लेकिन पहले तो उन्होंने मना कर दिया, बाद में तैयार हो गए। इसके बाद सलीम ने लर्निंग कैंप में ही रहकर प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। सलीम ने इलाहाबाद, दिल्ली, गुड़गांव, जोधपुर आदि में पढ़ाई कर स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की।
विज्ञापन

मोहम्मद सलीम जिले में ही दृष्टिबाधित बच्चों के लिए स्कूल खोलना चाहते हैं। सलीम कहते हैं कि शारीरिक अक्षमता कष्टदायी होती है, लेकिन जिंदगी जीना भी एक कला है। मैं चाहता हूं कि दृष्टि बाधित बच्चे भी सामान्य लोगों की तरह पढ़ लिखकर आगे पढ़े और आत्मनिर्भर बने।
विज्ञापन

00
संगीत में भी पारंगत है सलीम
सलीम ढोलक, हारमोनियम, कैसियो बजाने में भी पारंगत हैं। इतना ही नहीं, वह कार्यक्रमों में गीत व भजन भी गाते हैं। तत्कालीन डीएम मासूम अली सरवर तो उनकी ढोलक की थाप के ही दीवाने हो गए थे।
---
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें