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असम जैसे हालात तो नहीं पर यहां भी बंगाली समाज मुश्किल में

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असम जैसे हालात तो नहीं पर यहां भी बंगाली समाज मुश्किल में
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क्रासर...
मतदाता बनने के लिए तरस रहे विस्थापित/अविस्थापित बंगाली युवा
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत/माधोटांडा। तराई क्षेत्र में बड़ी संख्या में बसे बंगाली समाज के युवा यहां मतदाता बनने की लिए तरस रहे हैं। वोट न बनने से बंगाली समाज के लोग असमंजस की स्थिति में हैं। क्योंकि ढाई दशक पूर्व प्रशासन ने जिले में लगभग 25 हजार बंगाली मतदाताओं के वोट काटने के बाद उनसे भारतीय नागरिकता के प्रमाणपत्र मांगे थे। इससे बंगाली समाज में हलचल मच गई थी, लेकिन उसके बाद काफी वोट बनाए भी गए। अब एक बार फिर मतदाताओं की संतानों के वोट नहीं बन पा रहे हैं। इस स्थिति में बंगाली समाज के लोग परेशान हैं।
जनपद में बसे बंगाली समाज की संख्या पिछले लंबे समय से लगातार बढ़ रही है और आज उनको बसाने के लिए प्रशासन के पास एक समस्या पैदा होती जा रही हैं। बंगाली समाज के लोग नदी, नालों व झीलों के किनारे बसते जा रहे हैं लेकिन उनकी समस्या का निदान अभी नहीं हो सका हैं। लगभग ढाई दशक पूर्व एक साथ बंगाली समाज के 25 हजार मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से काट दिए गए थे। इसके बाद हड़कंप मच गया था। समाज के लोगों ने काफी लिखापढ़ी की, मामला गृह मंत्रालय तक पहुंचा लेकिन वहां से भी नागरिकता प्रमाणपत्र मांग लिए गए। हालांकि ऐसे लोगों से भी नागरिकता संबंधी सारे अभिलेख मांगे गए जिनके पास नागरिकता नहीं थी। इसके बाद बड़ी संख्या में शपथपत्र वकीलों का सहारा लेकर बनवाए और अन्य अभिलेखों को संलग्न कर गृह मंत्रालय भेजा गया।
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कई गिरोह भी हो गए थे सक्रिय
बंगाली समाज में मतदाता बनने के लिए नागरिकता का मामला उठा तो यहां बंगालियों के बीच मतदाता बनाने के लिए कई गिरोह सक्रिय हो गए। ऐसे अपंजीकृत बंगाली जिन्हें भारत की नागरिकता नहीं मिल पा रही थी उनसे धन उगाही कर दूसरे प्रांतों के कैंपों के फर्जी अभिलेख बनाकर देने शुरू कर दिए थे, लेकिन बाद में पुलिस ने इस गिरोह का पर्दाफाश कर कई सदस्यों को पकड़कर जेल भेजा था।
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क्या कहते हैं बंगाली समाज के जागरूक जनप्रतिनिधि
बंगाली समाज के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा हैं। मैं भारत का नागरिक हूं। नागरिकता प्रमाणपत्र है, लेकिन मेरे दो बच्चे उत्तराखंड के खटीमा में स्नातक की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उनका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा रहा है। उनसे भारत की नागरिकता का प्रमाणपत्र मांगा जा रहा हैं। जबकि वह यहीं जन्मे, बड़े हुए व पढ़ लिख रहे हैं। - शंकर राय, पूर्व प्रधान, गभिया सहराई
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हमारी ग्राम पंचायत में ऐसे सैकड़ों बच्चे हैं जो मतदाता बनने से वंचित हैं।ं जबकि उनके पास सभी अभिलेख हैं जो स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं। इसके अलावा और कौन सा प्रमाणपत्र चाहिए। भारत की नागरिकता प्रमाणपत्र देना सरकार का काम हैं। हम भारतवासी हैं। - दीपाली राय, ग्राम प्रधान, गभिया सहराई
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जो लोग बाद में बांग्लादेश से आकर कहीं बैठ गए हैं, उनके बारे में तो सरकार कुछ भी करें लेकिन जिनके माता-पिता के पास नागरिकता है। उनके जन्म यही हुए हैं ऐसे प्रमाण पत्र हैं। लेकिन उसके बावजूद हजारों युवा को मतदाता बनने से वंचित किया गया है। केंद्र सरकार व निर्वाचन आयोग को गंभीरता से गौर करना चाहिए। यह सौतेला व्यवहार हैं। - आशा मिस्त्री, ग्राम प्रधान, महाराजपुर
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बहुत से ऐसे भी बंगाली परिवार के लोग हैं जो दूसरे कैंपों से यहां आए। बाढ़ में उनके प्रमाण पत्र बह गए। बहुत से लोगों के अग्निकांड में भी अभिलेख जल गए। वह ऐसे प्रमाणपत्र कहां से लाएं। अभिलेख न होने से उनको भारत का नागरिक ना मानते हुए मतदाता नहीं बनाया जा रहा हैं। - प्रशांत साना, ग्राम प्रधान, रमनगरा
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बंगाली समुदाय के 18 वर्ष की आयु पूरी कर लेने वाले युवाओं के वोट बनाने के मामले में बीएलओ से जानकारी की जा रही है। यदि भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश के मुताबिक संपूर्ण अभिलेख उपलब्ध होंगे, होने पर ही तभी उन्हें मतदाता बनाया जा सकता है।- विवेक त्रिवेदी, तहसीलदार कलीनगर
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