नोएडा में छात्रसंघ चुनाव की तैयारी पूरी है। राजनीति का रंग हफ्तों पहले से चढ़ा है। कॉलेज राजनीति का अड्डा बना चुका है। कैंपस में पुलिस तैनात है।
कोई भी संगठन हार बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। झगड़े हो चुके हैं और गोलियां भी चल चुकी हैं। डिग्री कॉलेज छात्र संघ चुनाव की हार-जीत एबीवीपी, एनएसयूआई और सपा छात्र सभा समेत तीनों प्रमुख संगठनों के लिए नाक का सवाल बन गई है।
मुख्य रूप से प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी समर्थित सपा छात्र सभा के लिए यह अहम चुनाव होगा। दिल्ली यूनिवर्सिटी की फतेह और देश में चल रहा मोदी फैक्टर, अखिलेश सरकार का लैपटॉप या फिर राहुल गांधी का साथ... बस किसी भी तरह हर संगठन अपनी पार्टी के नाम पर सिर्फ और सिर्फ जीत चाहता है।
लगभग सात साल बाद 2012 में चुनाव हुए थे। ज्यादातर छात्र और पदाधिकारी छात्रसंघ चुनाव से अंजान थे। इस अनुभवहीनता का लाभ निर्दलियों को मिला और तीनों बड़ी पार्टी हार गई।
इस बार हर संगठन के लिए यह चुनाव उनकी इज्जत से जुड़ गया है। हार का बदला लेने के लिए तीनों पार्टियां बेताब हैं। गलतियों से सबक लेकर हर कदम फूंक-फूंक कर उठाया जा रहा है।
यही कारण है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और सपा छात्र सभा ने नामांकन से पहले बुधवार को अपना पैनल घोषित नहीं किया। पिछले साल हुई किरकिरी के कारण इस बार ठोक बजाकर नामांकन होगा। किसी भी संगठन के लिए हार का मतलब सीधे-सीधे कॉलेज से बेदखली जैसा होगा।