देवबंद। गुरुकुल श्री कृष्ण वाटिका आश्रम (सिद्ध कुटी) के संचालक शांतनु महाराज ऐसे विलक्षण सन्यासी और योगाचार्य हैं, जो आर्य समाज और सनातन धर्म के बीच सेतु के अनूठे कार्य में लगे हैं। उन्होंने करीब 50 वर्ष संन्यास लेकर अपना घर परिवार छोड़ दिया। इतना ही नहीं ओडिसा स्थित राउरकेला स्टील प्लांट से उन्हें निर्माण और आर्किटेक्टर इंजीनियरिंग के पद पर ज्वाइनिंग लेटर मिला था, लेकिन उक्त पद भी संन्यास के सम्मोहन में उन्होंने ठुकरा दिया था।
किसान पिता गणेश्वर दास और माता जहान्वी दास की इच्छा अपने बेटे शांतनु दास को उच्च शिक्षा दिलाने, शानदार कैरियर बनाने और उच्च ब्राह्मण घराने में विवाह कराने की थी, लेकिन शांतनु दास भारतीय दर्शन और सन्यास के सम्मोहन के वशीभूत होने के कारण हमेशा के लिए घर छोड़कर तप और साधना की सोच रहे थे। उन्होंने राउरकेला स्टील प्लांट में इंजीनियरिंग की सर्विस ज्वाइन करने से पहले ही माता-पिता से अनुमति मांगी की कि वह संन्यास लेना चाहते हैं और साधना, तपस्या के लिए जाना चाहते हैं। परिवार के लिए ये मुश्किल लम्हे थे, लेकिन शांतनु दास के दृढ़ संकल्प के सामने माता-पिता का प्यार और स्नेह प्रभाव शून्य रहा।
73 वर्षीय शांतनु महाराज बताते हैं कि कई वर्षों विद्वानों, धर्माचार्यों के संगत में रहने के बाद वह हरिद्वार स्थित गुरुकुल कांगड़ी पहुंचे, वहां उन्होंने नौ विषय में आचार्य, दो विषय में एमए, वेद विषय में पीएचडी की शिक्षा पूरी की। उन्होंने ज्योतिषाचार्य, आयुर्वेद चिकित्सा और संस्कृत विषय में भी निपुणता हासिल की। कट्टर सनातनधर्मी होने के बाद भी उन्होंने आर्य समाज के धर्मग्रंथों का भी अध्ययन किया। उनके ऊपर आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती की शिक्षाओं का असर पड़ा। वह सनातन धर्म के साथ - साथ आर्य समाज धर्म में भी पारंगत हो गए। वर्ष 2002 से स्वामी शांतनु महाराज देवबंद में सिद्ध कुटी पर अपना आश्रम बनाकर निरंतर अध्यात्म की साधना में लीन हैं। आश्रम में वह बच्चों को गुरुकुल पद्धति की शिक्षा देने के साथ-साथ गायों की सेवा भी करते हैं।