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गौरव की हार का जिम्मेदार कौन?

Wed, 17 Feb 2016 12:32 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
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मुजफ्फरनगर। उपचुनाव में हार से सपा को गहरा आघात लगा है। अंदरूनी कलह ने पार्टी को गर्त में पहुंचा दिया। पहले जिला पंचायत अध्यक्ष और अब उपचुनाव में करारी हार सहनी पड़ी।
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एमएलसी के प्रस्तावित चुनाव में भी नामांकन को लेकर फजीहत हुई। दो प्रत्याशी बदलने पड़े। गौरव की हार के लिए ऐसी ही कई वजह हैं।

शहर सीट से तीन बार एमएलए बने स्वर्गीय चितरंजन स्वरूप के बेटे गौरव की हार से सपा खेमे में मायूसी है। अपने पिता की विरासत को पाने की तैयारी में जुटे गौरव के लिए ही नहीं बल्कि सपा के लिए भी यह पराजय बड़ा झटका है।

पहले लोकसभा, फिर जिला पंचायत और अब उपचुनाव में वोटरों ने सपा को दरकिनार कर दिया। अंदरूनी कलहबाजी के चलते पार्टी लगातार गर्त में जा रही है। संगठन बेलगाम है। पार्टी के बड़े नेताओं का पदाधिकारियों पर कोई अंकुश नहीं है। नेताजी के बर्थडे कार्यक्रम में जूतमपैजार हुई और सिर फूटे।
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श्यामलाल उर्फ बच्ची सैनी को जिलाध्यक्ष बनाना भी पार्टी के काम नहीं आया। उनकी अपनी बिरादरी के वोटों में ही पकड़ साबित नहीं हुई। शाहपुर में ब्लाक प्रमुख चुनाव में उनके प्रत्याशी को महज दो वोट मिले थे। यह बात भी दीगर है कि बच्ची को जिलाध्यक्ष बनवाने का निर्णय भी गौरव का ही था।

पार्टी ने कैबिनेट मंत्री कमाल अख्तर को चुनाव प्रभारी बनाया, जबकि उन्हें यहां की कोई सियासी जानकारी नहीं थी। पार्टी का कोई भी बड़ा नेता सपा के पक्ष में चुनावी सभा के लिए नहीं आया।

जिला प्रभारी मंत्री आजम खान ने भी चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं ली। इसकी वजह हिंदू मतों का ध्रुवीकरण रोकना भी बताया जा रहा है।

जैसा पूर्व मंत्री उमा किरण के साथ जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में हुआ, वैसा ही गौरव को झेलना पड़ा। जिले में पार्टी के बड़े नेता एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ा पाए। सिर्फ मंचों पर रस्म अदायगी के लिए चेहरा दिखाते नजर आए।

शहर के कई इलाकों में मिले वोट प्रतिशत से साफ हुआ कि पार्टी के नेताओं ने ही गौरव का साथ नहीं दिया। गांधी कालोनी, द्वारिकापुरी, नई मंडी, ब्रह्मपुरी, कूकड़ा, भरतिया कालोनी आदि में सपा को कम वोट मिलने से भाजपा की जीत हो गई। वैश्य बिरादरी में भी गौरव की पकड़ दिख रही थी, लेकिन वह वोटों में तब्दील नहीं हो पाई।

प्रचार के लिए आए राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल और एमएलसी सरोजनी अग्रवाल भी वैश्य मतों को सपा के पक्ष में नहीं कर पाए। छह माह पहले पार्टी ने उन्हें टिकट दे दिया था, मगर धरातल पर वह मजबूती नहीं दिखा पाए। खासकर आम आदमी से जुड़ने में उन्होंने चूक की।
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