विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद बसपा का दलित-मुस्लिम समीकरण का खुमार उतर गया है। बसपा अपने पुराने राजनीति पैटर्न पर वापस आने लगी है। हाल ही में जिला कार्यकारिणी और विधानसभा क्षेत्र की कमेटियों की घोषणा में पार्टी ने दलितों के साथ ओबीसी को जोड़ने की कवायद फिर से शुरू कर दी है। बसपा ने पुराने बेस वोट को बचाने के लिए प्रयास फिर से प्रारंभ कर दिए हैं।
बसपा की दलित-मुस्लिम की राजनीति के चलते पार्टी से जुड़ा अति पिछड़ा वोट बैंक खिसक कर भाजपा की झोली में चला गया था। अति पिछड़ा इस बात से नाराज था कि उसे संगठन और टिकट में सम्मान नहीं मिला। बसपा का थिंक टैंक भी यह बात भलीभांति समझ गया है कि बिना अति पिछड़ों को साथ लिए राजनीति संभव नहीं है। मुस्लिम भी तभी साथ आएगा, जब दलित और अति पिछड़े पार्टी के पीछे खड़े दिखाई देंगे।
इसी के चलते पार्टी ने जिलाध्यक्ष के पद पर अति पिछड़ी जाति के शिव कुमार कश्यप को नियुक्त किया है। नई कार्यकारिणी में जातीय समीकरणों का विशेष ध्यान रखा गया है। हालांकि पार्टी ने सभी कमेटियों में मुस्लिमों का समावेश भी किया है।
जिले की कमेटी में शिवकुमार कश्यप को जिलाध्यक्ष, जियाउर्रहमान को जिला उपाध्यक्ष, कमल गौतम जिला महासचिव, ब्रिजेश कुमार सचिव, राहुल ठाकुर कोषाध्यक्ष, श्यामलाल प्रजापति कार्यालय प्रभारी, राजेंद्र कुमार बीवीएफ के अध्यक्ष बनाए गए। इसी तरह विधानसभा क्षेत्रों की कमेटी बनाई गई। बुढ़ाना विधान सभा क्षेत्र के अध्यक्ष निर्मलदास, पुरकाजी रघवीर कश्यप, खतौली अविनाश जयंत, चरथावल अमित कुमार, मुजफ्फरनगर रमेश भारती, मीरापुर सतीश कुमार को बनाया गया। इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि जिलाध्यक्ष कमल गौतम का पद घटाकर उन्हें जिला महासचिव बना दिया गया।