मुजफ्फरनगर। रामपुर तिराहा कांड के चश्मदीद मजदूर ने 31 साल बाद बर्बरता के आरोपी तीन पुलिसकर्मियों की पहचान की। अदालत में बताया कि सांवला रंग, काले बाल और मोटी मूंछ वाले सिपाही ने सूटकेस लूट लिया था। आंदोलनकारी महिलाएं चीख रही थीं। कुछ पुलिसकर्मी बाहर खड़े हो गए और कुछ बस में भी सवार हुए थे।
सीबीआई बनाम राधा मोहन द्विवेदी की पत्रावली की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-9 में हुई। खतौली क्षेत्र के गांव का 58 वर्षीय मजदूर सुरक्षा के बीच अदालत लाया गया। गवाह ने रामपुर तिराहे का मंजर बयान किया।
पुलिसकर्मियों ने उत्तराखंड के आंदोलनकारियों के वाहन रोक दिए थे। होटल बंद करा दिए गए। कुछ महिलाओं को खाना भी नहीं मिला था। पुलिसकर्मियों ने लाठीचार्ज किया तो भगदड़ मच गई। गोपेश्वर से पहुंची महिला आंदोलनकारियों की बस के ड्राइवर को पुलिसकर्मियों ने ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिला।
इसके बाद एक पुलिसकर्मी खुद ही बस चलाकर शहर की तरफ चला गया।
अदालत में पेश हाजिर सात पुलिसकर्मियों में से गवाह ने कृपाल सिंह, राकेश कुमार और वीरेंद्र कुमार की पहचान की। अगली सुनवाई के लिए चार अगस्त नियत की गई।
क्या था मामला
एक अक्तूबर, 1994 को अलग राज्य की मांग के लिए देहरादून से बसों में सवार होकर आंदोलनकारी दिल्ली के लिए निकले थे। देर रात रामपुर तिराहा पर पुलिस ने आंदोलनकारियों को रोकने का प्रयास किया। आंदोलनकारी नहीं माने तो पुलिसकर्मियों ने फायरिंग कर दी, जिसमें सात आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी। आरोप है कि महिला आंदोलनकारियों के साथ छेड़खानी और दुष्कर्म किया। उत्तराखंड संघर्ष समिति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 25 जनवरी 1995 को सीबीआई ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए थे, जिसकी सुनवाई चल रही है।
अब इन मामलों में चल रही सुनवाई
सेशन कोर्ट में सीबीआई बनाम राधा मोहन द्विवेदी की पत्रावली पर सुनवाई चल रही है जबकि सीबीआई बनाम बृज किशोर और सीबीआई बनाम एसपी मिश्रा की पत्रावली का मजिस्ट्रेट ट्रायल चल रहा है।