मुजफ्फरनगर। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने प्रेरक व्यक्तित्व से देश को नई दिशा दी थी। उन्होंने न सिर्फ राजनीति में, बल्कि साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जन-जन को अपना मुरीद बना लिया था। उनकी नपी-तुली और बेबाक बातें आज भी नहीं भूलती है।
अटल बिहारी वाजपेयी की 16 अगस्त को द्वितीय पुण्यतिथि है। वे जनसंघ और भाजपा को गांवों की दहलीज तक ले गए। खुद की विचारधारा और कर्मठता से उन्होंने भारतीय राजनीति के शिखर को छुआ। चाहे प्रधानमंत्री रहे हों या नेता प्रतिपक्ष, बेशक देश की बात हो या क्रांतिकारियों की या फिर उनकी अपनी कविताओं की, उनकी दूरदृष्टि बातें और निर्भीक टिप्पणी स्मृतियों में ताजा है। वाजपेयी, शिक्षाऋषि स्वामी कल्याण देव को अनूठे एवं सरल संत कहते थे। खतौली में तीन जुलाई, 1993 को मंडी धर्मशाला में लेखक डॉ. पवन कुमार जैन की पुस्तक विदेशों में हिंदी पत्रकारिता का विमोचन समारोह था, जिसमें अटल जी पधारे थे। वाजपेयी ने मंच पर मौजूद शिक्षाऋषि को महान सेवाभावी विरक्त संत बताया था। वर्ष 1996 में टाउनहाल में हुई सभा में सड़कों की खस्ता हालत पर उनके जुमले ‘सड़क में गड्ढे या गड्ढों में सड़क’ ने देश में सुर्खियां पाई थीं। चरथावल के पूर्व विधायक रणधीर सिंह बताते है कि उनकी यादें अमिट हैं।
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राजनीति में घोली इंसानियत
वर्ष 2000 में जब अटल जी देश के प्रधानमंत्री थे, तभी शिक्षा ऋषि को भारत सरकार ने अमूल्य समाज सेवा के लिए ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया था। वाजपेयी ने वर्ष 2002 में नई दिल्ली के पीएम आवास पर गुरुदेव के जीवन पर आधारित तीन सदी के युग दृष्टा ग्रंथ का विमोचन किया था। उन्होंने राजनीति में इंसानियत और आदर्श मूल्यों को स्थापित किया। - स्वामी ओमानंद, पीठाधीश्वर, भागवत पीठ शुकदेव आश्रम
लाजवाब लगा था कॉफी का स्वाद
वाजपेयी को खाने-खिलाने का बड़ा शौक था। वर्ष 1970 में मोहल्ला खटीकान में आवास पर आये थे। उन्हें कॉफी का स्वाद लाजवाब लगा। बोले, बाजार से मंगाई क्या, घर में ही बनी है, ये जानकर कहा कि पत्नि को बुलाओ। मैंने उत्तर दिया कि अभी तो शादी नहीं हुई। मां कलावती ने कॉफी तैयार की है। वे मेरी माता से मिले और चरण स्पर्श किया। कई बार उनके चुनावी प्रचार में भोजन लेकर जाने का सौभाग्य मिला था। - डॉ. सुरेश संगल, पूर्व विधायक।
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विरोधियों को बना लेते थे मुरीद
लोक सभा में दो मर्तबा वाजपेयी जी के सानिध्य में उनकी राजनीतिक दूरदृष्टि को सुनने का मौका मिला। सबको साथ लेकर चलने की क्षमता से वे सर्वप्रिय बने। विपक्षी भी उनके मुरीद रहते थे। वर्ष 1998 में तत्कालीन पीएम के रुप में जीआईसी के मैदान में मेरी चुनाव रैली में आए थे। - सोहनवीर सिंह, पूर्व सांसद।