आबादी के बीच में चल रही शुगर मिलें खतरा बन गई हैं। मिलों में कई तरह के केमिकल इस्तेमाल होने से आबादी के लिए कभी भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इतना ही नहीं शुगर मिलों से निकल रहे दूषित जल ने आसपास के क्षेत्रों में पानी का जायका बिगाड़ दिया है। खेतों में भी फसलें प्रभावित हो रही हैं।
शामली के सरशादी लाल डिस्टलरी के बायो गैस प्लांट में मंगलवार को हुए गैस के रिसाव से बच्चों की हालत बिगड़ गई थी। खतौली, मंसूरपुर और रोहाना में भी शामली जैसा हादसा होने के खतरे कम नहीं हैं। यहां पर भी शुगर मिलें आबादी के बीच में चल रही हैं।
हालांकि शुगर मिलों की स्थापना के समय क्षेत्रों की आबादी कम थी, जो अब धीरे-धीरे बढ़कर बड़ी संख्या में तब्दील हो गई है। खतौली की त्रिवेणी शुगर मिल घनी आबादी वाले दो गांवों शेखपुरा और इस्लामाबाद भूड़ (खतौली ग्रामीण) से घिरी है। शुगर मिल में पेराई सत्र के समय खोई से विद्युत उत्पादन किया जाता है, जिसमें बड़े-बड़े बॉयलरों में खोई जलती है। इतना ही नहीं, खोई से निकलने वाली गंध से शेखपुरा और खतौली ग्रामीण भी प्रभावित हैं।
यह सूखने और मिठास होने के कारण तेजी से आग पकड़ती है। जिसको लेकर हर समय खतरा बना रहता है। मंसूरपुर में भी शुगर मिल आबादी के नजदीक है। यहां भी ऐसी स्थिति में आबादी को खतरा बन सकता है। रोहाना शुगर मिल के निकट भी आबादी है। यहां भी ईंधन के रूप में बैगास का प्रयोग होता है। इन शुगर मिलों से गैस का खतरा भले ही न हो, लेकिन दूषित जल के जनजीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। हालांकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से हर तीन माह में जांच रिपोर्ट तैयार होती है। शुगर मिलों को इसके लिए गाइड लाइन जारी की जाती है।
दूषित जल पी रही 30 हजार की आबादी
मुजफ्फरनगर। खतौली में त्रिवेणी शुगर मिल के कारण दूषित जल को बाहर निकालने के लिए नाले का प्रयोग किया जाता है, जो शेखपुरा और खतौली ग्रामीण से होकर निकलता है। इस नाले में गंधक-पोटास के साथ अन्य केमिकलयुक्त जल बहता है। जिसके चलते दोनों गांवों की करीब 30 हजार की आबादी दूषित जल पी रही है। मिल के नाले के कारण दोनों गांवों में भूजल प्रभावित हो गया है। इससे कई तरह की बीमारियां पनप रही हैं।
मंसूरपुर में भी पानी का खतरा अधिक
मुजफ्फरनगर। मंसूरपुर शुगर मिल और डिस्टलरी में गैस का प्रयोग नहीं है, लेकिन उत्पाद की सफाई के लिए केमिकलों का इस्तेमाल खूब है। यहां उत्पाद को धोने के बाद ईटीपी के जरिए पानी को नाले में छोड़ा जाता है। जिसके चलते यहां भी जल प्रदूषण की संभावनाएं अधिक हैं।
कई स्कूल भी हैं आसपास संचालित
मुजफ्फरनगर। खतौली के गांव शेखपुरा में कई पब्लिक स्कूल, इंटर कालेज तक शुगर मिल के आसपास बने हैं। ऐसा ही खतौली ग्रामीण क्षेत्र में है। साथ ही विद्युत प्लांट के सामने शुगर मिल का ईश्वरदास रायबहादुर साहनी स्कूल संचालित है। कुल मिलाकर मंसूरपुर, रोहाना और खतौली मिल के निकट दो हजार से अधिक छात्र-छात्राएं शिक्षा ग्रहण करते हैं।
विभिन्न गैसों का दुष्प्रभाव
क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लैब टेक्नीशियन विजय कुमार ने बताया कि मिथेन, ईथेन, कार्बन डाईऑक्साइड यह सभी गैस रंगहीन होती हैं, जिनकी मात्रा बढ़ने पर जी मिचलाना, चक्कर आना, बेहोशी छाने के साथ उल्टियां भी लगती हैं। समय पर उपचार न मिले तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जबकि कार्बन मोनो ऑक्साइड आदि वाहनों के धुएं से निकलती है। यह भी अत्यधिक होने पर नुकसान पहुंचा सकती है।
क्या कहतें हैं मिल अधिकारी
शुगर मिल में किसी गैस का प्रयोग नहीं किया जाता है। विद्युत बनाने में गन्ने से निकली खोई प्रयुक्त होती है। मिल में री-साइकिलिंग प्लांट लगा है, जिसके माध्यम से सफाई कर पानी किसानों को खेत में इस्तेमाल करने के लिए दिया जाता है - डॉ अशोक कुमार, उपाध्यक्ष, त्रिवेणी शुगर मिल खतौली।
शुगर यूनिट आठ माह बंद रहती है, जबकि चार माह चलती है। मिल में कोई गैस नहीं बनती और न ही प्रयोग होती है। ईंधन के लिए बेगास इस्तेमाल होती है, जिससे कोई खतरा नहीं है। मिल में हर तरह से सुरक्षा के इंतजाम हैं - ओंकारनाथ तिवारी, सीनियर मैनेजर, डीएसएम शुगर मिल मंसूरपुर।