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Muzaffarnagar News: जिन्हें छोड़ आए थे...आखिरी विदाई के लिए उनकी तलाश

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भौराकलां में मंदिर का वह कमरा, जहां हत्या हुई: संवाद
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भौराकलां (मुजफ्फरनगर)। भौराकलां के गुंबज शिव मंदिर में साधु देवानंद भारती (81) का पोस्टमार्टम कराने के बाद शव को 72 घंटे के लिए सुरक्षित रखवा दिया गया है। जिस परिवार को भारती दो दशक पहले छोड़ आए थे, अब पुलिस उसकी तलाश में जुटी है। मध्य प्रदेश पुलिस से संपर्क साधा गया है। कोशिश है कि साधु के शव को उसके परिजनों के ही सुपुर्द किया जाए।
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कुरावा मार्ग के मंदिर में मंगलवार रात आठ बजे दो हमलावरों ने तमंचे से सीने में गोली मारकर साधु भारती की हत्या कर दी थी। बुजुर्ग साधु की जान जाने के बाद सवाल पहचान का उठा तो पुलिस ने जवाब ढूंढना शुरू किया। ग्रामीणों ने सिर्फ इतना बताया कि दो दशक से वह इस मंदिर में अकेले रह रहे हैं। कभी गांव में लोगों के पास पहुंचकर खाना खाते थे और कभी किसान भी मंदिर में उन्हें भोजन उपलब्ध करा देते थे।
साधु ने यह भी बताया था कि वह फौज से सेवानिवृत्त है और अपना घर छोड़कर आया है। पेंशन पर ही गुजारा कर रहा है। कभी कोई संदिग्ध गतिविधि ग्रामीणों को नजर नहीं आई तो सवाल भी खत्म हो गए और बीस साल गुजर गए। बुधवार को पोस्टमार्टम के बाद शव को भौराकलां के ग्रामीणों को नहीं दिया गया है।
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पुलिस अभी 72 घंटे का इंतजार करेगी। इसके अलावा ग्वालियर पुलिस के माध्यम से भी पहचान का प्रयास किया जा रहा है। सीओ फुगाना नरेंद्र यादव का कहना है कि शव को रखवा दिया गया है। परिजनों के आने का इंतजार किया जाएगा।
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पुलिस ने दो संदिग्ध पकड़े, सीसीटीवी खंगाले
साधु की हत्या के खुलासे के लिए पुलिस ने भौराकलां के ही दो संदिग्ध युवकों से पूछताछ की है। इसके अलावा आसपास के गांवों के सीसीटीवी कैमरे खंगाले जा रहे हैं। सर्विलांस टीम के हाथ भी महत्वपूर्ण सुराग लगे हैं।
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प्राथमिकी दर्ज, वजह पर अटकी हुई बात
बराबर की आईटीआई में ड्यूटी कर रहे पीआरडी के जवान मौसम अली की तहरीर पर भौराकलां थाने में अज्ञात हमलावरों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। सवाल यह है कि बुजुर्ग साधु की हत्या किसने और क्यों की। मंदिर की संपत्ति, रुपये के लेन-देन, कहासुनी का विवाद और नशे के बिंदु पर भी पुलिस जांच कर रही है।
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मंदिर पुराना...अकेले साधु का ठिकाना
भौराकलां गांव का गुंबज मंदिर सैंकड़ों साल पुराना है। भौराकलां, जैतपुर, गढ़ी नौआबाद, कुरावा और खरड़ समेत अन्य गांव के लोग यहां आते-जाते रहे। बाद में अन्य कई मंदिर बने तो यहां पर लोगों की आवाजाही कम हुई। दोपहर के समय किसान-मजदूरों का ठिकाना भी यह मंदिर बन गया। सुनसान जंगल के मंदिर में साधु अकेला रहता था।
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