रमजान सब्र का महीना, सब्र का इनाम जन्नत
देेवबंद। मदरसा जामिया तुश शेख हुसैन अहमद अल मदनी के मोहतमिम मौलाना मुजम्मिल अली ने कहा कि रमजान के महीने में अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को माफ कर उन्हें दोजख से आजादी का परवाना अता करता है। रमजान सब्र का महीना है और सब्र का इनाम जन्नत है।
मौलाना मुजम्मिल अली ने बताया कि सब्र का रमजान से गहरा ताल्लुक है। रोजे की हालत में इंसान खाने-पीने और जिस्मानी ख्वाहिशात से रुकता है। इस मुबारक महीने में हम गरीब, असहाय और जरूरतमंदों का भी खयाल रखें और सदका व खैरात से उनकी मदद करें। हजरत मोहम्मद साहब ने फरमाया कि जब रमजानुल मुबारक की पहली रात आती है तो अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर तशरीफ लाते हैं और फरिश्तों के जरिये एलान करते हैं कि है कोई माफी मांगने वाला, जिसको मैं माफ कर दूं, है कोई औलाद की तमन्ना करने वाला जिसे मैं औलाद की नेअमत अता कर दूं, है कोई बीमारी से शिफा मांगने वाला जिसे मैं बीमारी से छुटकारा दे दूं। यह एलान सुबह तक होता रहता है। कितने कीमती, मुबारक हैं ये लम्हे कि देने वाला खुद आवाज लगा रहा है।
मौलाना मुजम्मिल ने कहा कि रोजा ऐसी इबादत है जो रूहानी और जिस्मानी एतबार से इंसान के लिए फायदेमंद है। रोजा व्यवहार, इंसाफ, इंसानियत, हमदर्दी व गमख्वारी का सबक देता है। रोजे से तकवा हासिल होता है, दिल को सुकून मिलता है। रोजे में भूखा रहने से इंसान के उन अंगों में सुस्ती पैदा हो जाती है, जो गुनाह की ओर ले जाते है। जब इंसान भूख बर्दाश्त करता है तो उसके दिल में गरीबों और भूखों के लिए हमदर्दी पैदी होती है। अल्लाह ने रमजान का रोजा फर्ज किया, ताकि उसके बंदे नेक बनें और उनके दिल में गरीबों की भलाई का जज्बा पैदा हो सके।