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 मुआवजा नहीं, हमें बेटा प्यारा      

Fri, 14 Oct 2016 12:51 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
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गुलफाम के परिजन। - फोटो : अमर उजाला
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दंगे में लापता बताए गए गुलफाम के जीवित होने के मामले में उसके अब्बा और अम्मी ने कहा कि उन्हें मुआवजा नहीं बेटा प्यारा है। दंगे के दौरान जब उसका कोई अता-पता नहीं चला तो उसकी गुमशुदगी दर्ज करानी पड़ी थी। अब कैसे मुख्यमंत्री की लापता आश्रित सूची में उसका नाम शामिल कर लिया गया हमें कुछ नहीं मालूम।       
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दंगे के दौरान सोरम गांव के मेहरदीन के बेटे गुलफाम के लापता होने का मामला जितना दिलचस्प है, उतना ही पुलिस की लापरवाही का सबूत भी। दो साल तक एसआईटी और पुलिस यह पता नहीं लगा पाई कि गुलफाम कहां है?  मुआवजा सूची में नाम कैसे पहुंच गया खुद परिजन हैरत में है। मेहरदीन ने बताया कि पत्नी से तलाक की वजह से उनका बेटा मानसिक रूप से परेशान था।

दंगे से पहले वह बुढाना में अपनी बहन की ससुराल चला गया। अचानक वहां से गायब होने के बाद किसी भय की आशंका में उसकी थाने में गुमशुदगी लिखा दी थी। एक साल पहले उन्हें छपरौली के एक आदमी से पता चला कि उनका बेटा मेरठ जेल में है। वहां वह जीशान नाम से बंद है। हमने शाहपुर पुलिस को उससे मिलने के बाद लिखित में सूचना दी।
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तत्कालीन एसडीएम जेपी गुप्ता ने सोरम आकर खुद जांच की थी। पिता मेहरदीन और अम्मी मकसूदी ने कहा कि उन्हें 15 लाख के मुआवजे का कोई लालच नहीं था। बेटा मिल गया यही खुदा का शुक्र है। पत्नी से विवाद और तलाक की वजह से वह मानसिक संतुलन खो चुका है।      

खेकड़ा थाने में जीशान बना गुलफाम      
सात सितंबर 2013 के दंगे से चार दिन पहले गुलफाम बागपत के खेकडा थाना क्षेत्र में चला गया, जहां उसकी किसी से मारपीट हो गई। वहां वह एक नाई की दुकान में घुस गया। उसने उस्तरा उठाकर एक युवक को घायल कर दिया। भीड़ ने पकड़ उसे पुलिस को सौंप दिया। उसके खिलाफ खेकड़ा थाने में मुकदमा दर्ज हुआ तो वहां उसने अपना नाम जीशान पुत्र मेहरदीन बता दिया।       
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