शहर के लद्दावाला से 15 अक्तूबर 2019 की शाम संदिग्ध हालात में अधिवक्ता समीर सैफी गायब हो गए थे। इसके बाद 19 अक्तूबर को भोपा क्षेत्र के सीकरी में शव बरामद हुआ था। पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि 40 लाख के लेन-देन के विवाद में अधिवक्ता का अपहरण कर हत्या की वारदात अंजाम दी गई थी।
वादी अजहर ने मुकदमा दर्ज कराया। पुलिस ने बकरा मार्केट निवासी सोनू उर्फ रिजवान, सिंगोल अल्वी, शालू उर्फ अरबाज एवं भोपा के सीकरी निवासी दिनेश के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया।
अभियोजन पक्ष की ओर से छह गवाह अदालत में पेश किए। शनिवार को आरोपियों पर दोष सिद्ध हुआ था। अदालत ने सोमवार को सुनवाई करते हुए सोनू उर्फ रिजवान, सिंगोल अल्वी, शालू उर्फ अरबाज को फांसी की सजा सुनाई। चौथे आरोपी दिनेश को सात साल की सजा सुनाई गई।
क्या था मामला
पुलिस ने खुलासा किया था कि समीर का आरोपियों के साथ करीब 40 लाख रुपये के लेन-देन का हिसाब था। मृतक अपने रुपये मांग रहा था लेकिन आरोपियों ने देने से मना कर दिया और हत्या की साजिया रची। शहर से कार में ले जाकर भोपा क्षेत्र के सीकरी फार्म पर रस्सी से गला घोंटकर हत्या कर दी और शव को मिट्टी में दबा दिया।
वारदात के दिन हुआ था चैंबर का उद्घाटन
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया गया है कि मृतक मोहम्मद समीर एडवोकेट नही था, क्योंकि वह निजी व्यापार भी करता था। इस पर अभियोजन की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया कि यह बात सही है कि समीर एडवोकेट पूर्व में निजी व्यापार भी करता था और नया-नया बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में रजिस्ट्रेशन कराकर अधिवक्ता नियुक्त हुआ था। अजहर ने अपने मुख्य बयान में कथन किया है कि घटना के दिन ही समीर ने कचहरी में अपने चैंबर का उद्घाटन किया।
सिंगोल अल्वी के साथ सुबह झगड़ा, शाम को हत्या
जांच में सामने आया कि कार सिंगोल अल्वी की थी। आरोपी सोनू उर्फ रिजवान कार का ड्राईवर था, जबकि शालू उर्फ अरबाज और दिनेश उसके नौकर थे। सिंगोल अल्वी ने सीकरी में एक मुर्गी फार्म बना रखा था।
दिनेश मुर्गी फार्म की देखभाल करता था। रॉयल पोल्ट्री फीड के नाम से समीर का रजिस्ट्रेशन था और इसी नाम से उसके बैंक खाते थे। फर्म को चलाने के लिए करीब 25 लाख रुपये का लोन भी लिया था। वारदात की सुबह आठ बजे लेन-देने को लेकर उसके भाई का सिंगोल अल्वी के साथ झगड़ा हो गया था।
फैसले में लिखी गई यह कविता....
''कचहरी की सीढ़ियों पर,
आज सन्नाटा कुछ बोल रहा है,
जहां दलीलों की गूंज थी कल,
वहां खामोशी डोल रही है,
काला कोट जो ढाल बना था,
सच की हर एक लड़ाई में,
वो गिर पड़ा आज जमीन पर,
झूठ की गहरी साजिश में,
कल तक जो कानून था जिंदा,
हर जुर्म को आईना दिखाता था,
आज उसी के रखवाले को,
किसी ने बेरहमी से सुला डाला,
पर ये खून बेकार नहीं जायेगा,''