मुजफ्फरनगर। छपार के बरला गांव का सजायाफ्ता शाहनवाज खूंखार अपराधी है। वर्ष 1998 में डकैती की पहली प्राथमिकी दर्ज हुई। वर्ष 2009 तक 26 केस दर्ज हुए, जिनमें हत्या के पांच, लूट, डकैती, जानलेवा हमले और गैंगस्टर के मामले हैं।
अपने भाई शौकीन के साथ मिलकर दहशत फैला दी थी। दोषी पर तीन बार गैंगस्टर लगाया गया। दो बार छपार थाने की पुलिस ने जिला बदर किया। अभियुक्त पर हत्या के चार मुकदमे दर्ज हैं। दो बार आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया जा चुका है। अदालत ने कहा कि शाहनवाज की भाव भंगिमा को देखा गया, कभी नहीं लगा कि दोषी को अपने किए का पछतावा है।
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24 साल पहले की ऑर्डर सीट भी फटी हुई मिला
अदालत ने अपने आदेश में लिखा कि प्रकरण में 17 जुलाई 2002 की ऑडर्र शीट जानबूझकर बीच से फाड़ी गई है। अभियुक्त शाहनवाज को अनुपस्थित दिखाया गया है। इसके बाद दो जून 2010 को शाहनवाज को जिला कारागार में निरुद्ध बताया गया है।
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न्याय में देरी न्याय से इन्कार के समान
अदालत ने लिखा कि कहावत भी है कि न्याय में देरी, न्याय से इन्कार के समान है। इस मूलभूत कानूनी सिद्धांत का अर्थ है कि यदि कोई कानूनी उपाय या समाधान समय पर प्रदान नहीं किया जाता है तो यह प्रभावी रूप से किसी भी उपाय के न होने के समान है। यह सिद्धांत त्वरित और कुशल कानूनी प्रणाली के महत्त्व को रेखांकित करता है। जब न्यायिक प्रक्रिया वर्षों तक खींचती है तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जैसे- साक्ष्य और गवाहों की स्मृति का क्षरण हो सकता है, पीड़ितों को अपूर्णनीय मानसिक और आर्थिक पीड़ा का सामना करना पड़ सकता है ।