साल 2009 में पलटा मिथलेश की किस्मत का पासा
बसपा के टिकट पर सदर विधानसभा सीट से वर्ष 1996 में पहला और 2002 में दूसरा चुनाव लड़ा और तीसरे स्थान पर रहीं। इसके बाद उन्होंने बसपा छोड़कर रालोद से राजनीति की नई पारी की शुरुआत की। रालोद के टिकट पर पहले पालिका का चुनाव लड़ा, फिर सदर सीट से ही वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में उतरी, लेकिन हार का सामना करना पड़ा।
मोरना के रालोद विधायक कादिर राना बसपा में शामिल हुए और मुजफ्फरनगर से 2009 में सांसद चुन लिए गए। यहीं से मिथलेश पाल का सियासी भाग्य पलटा। पहली बार सदर सीट छोड़कर मोरना के उपचुनाव में उतरीं और तत्कालीन सांसद कादिर राना के भाई नूर सलीम राना को हराकर विधानसभा पहुंची थीं।
ऐसा है मीरापुर सीट का इतिहास
परिसीमन के बाद मोरना से सीट मीरापुर बन गई। रालोद के टिकट पर मीरापुर से 2012 और 2017 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। सपा सरकार में मंत्री रहे चितरंजन स्वरूप के निधन के बाद 2016 में सदर सीट के उपचुनाव में भी मिथलेश पाल को वर्तमान राज्यमंत्री कपिल देव अग्रवाल के सामने हार का सामना करना पड़ा था।
मिथलेश को रास नहीं आई साइकिल की सवारी
साल 2017 में मिथलेश पाल सपा में शामिल हुई। सपा ने उन्हें शहर पालिकाध्यक्ष का चुनाव लड़ाया, लेकिन जीत नहीं मिली। वर्ष 2022 के चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन से टिकट नहीं मिला। फरवरी 2022 में वह भाजपा में शामिल हो गई थीं।
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इस तरह मिथलेश ने बदले राजनीतिक दल
मीरापुर विधायक मिथलेश पाल ने बसपा से राजनीति शुरु की। रालोद में सबसे ज्यादा चुनाव लड़े। सपा में शामिल हो गई, लेकिन 2022 में टिकट नहीं मिला। इसके बाद भाजपा में शामिल हुई। लोकसभा के चुनाव में भाजपा-रालोद गठबंधन हुआ। मीरापुर के उपचुनाव में टिकट मिलने के बाद भाजपा से वह रालोद में शामिल हो गईं।
रालोद के टिकट पर अब तक सात चुनाव लड़े
मीरापुर विधायक मिथलेश पाल ने पिछले 17 साल में रालोद के टिकट पर अब तक सात चुनाव लड़े हैं। इस बार वह भाजपा में थी, लेकिन उपचुनाव रालोद के सिंबल पर ही लड़ा।