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कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं स्कूल संचालक 

Sat, 08 Apr 2017 12:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
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हादसे के बाद डरे-सहमे बच्चे। - फोटो : अमर उजाला
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जरा सोचिए! जिन नौनिहालों को मामूली ठेस लगने पर आप कांप उठते हैं। उनके बेहतर भविष्य के लिए सपने संजो रखे हैं, उन्हें स्कूल आने-जाने के लिए जोखिम भरा सफर करना पड़ रहा है। कई स्कूलों में गैस किट लगी गाड़ियों से बच्चे ढोए जा रहे हैं। मोटी फीस वसूलने वाले स्कूल संचालक बच्चों की सुरक्षा के लिए कितने जिम्मेदार हैं, यह सिखेड़ा में चलती वैन में लगी आग की घटना ने जाहिर कर दिया है।
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पब्लिक स्कूल फीस और किताबों के साथ ट्रांसपोर्ट के नाम पर अभिभावकों से मोटा चार्ज वसूलते हैं। अधिकांश स्कूलों ने वैन, टॉटा मैजिक, मिनी बस समेत जीप को स्कूली वाहन के तौर पर लगा रखा है। कहीं-कहीं तो जुगाड़ भी बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने का काम कर रहे हैं।

इन वाहनों का मानकों के अनुरूप न तो फिटनेस कराया जाता है और न ही समय पर इनकी सर्विस होती है। नियमों के विपरीत वैन में गैस किट लगाकर स्कूली बच्चों की जान से खिलवाड़ किया जा रहा है। जनपद में 252 स्कूली वाहन पंजीकृत हैं, लेकिन अधिकांश बिन फिटनेस और अप्रशिक्षित चालकों के दौड़ाए जा रहे हैं। नतीजतन, दुर्घटनाएं होने के कारण बढ़ रहे हैं। 
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उधर, शासन भी लगातार स्कूली वाहनों पर शिकंजा कसने के लिए फिटनेस की जांच के निर्देश दे चुका है। एआरटीओ कार्यालय ने आदेशों को ताक पर रखा हुआ है। जांच के नाम पर मौन साधकर स्कूली संचालकों के वाहनों को दौड़ाने की अनुमति दे रखी है। एआरटीओ प्रवर्तन सुभाष राजपूत कहते हैं कि स्कूली वाहनों की जांच के आदेश आए हैं।

एआरटीओ प्रशासन, टेक्निकल आफिसर के साथ स्कूल में वाहन की फिटनेस की जांच करेंगे। उधर, एआरटीओ प्रशासन राजीव कुमार बंसल ने बताया कि सिखेड़ा क्षेत्र में जिस वैन में आग लगी है, वह स्कूल की नहीं थी। प्राइवेट वैन थी, जो बच्चों को लेकर जा रही थी। इसकी जांच कराई जा रही है।                         

एनजीटी ने रोका तो देहात में दौड़ाए
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दस साल पुराने डीजल और 15 साल पुराने पेट्रोल वाहनों के एनसीआर में संचालित करने पर प्रतिबंध लगाया है। ऐसे में इन वाहनों को देहात क्षेत्रों में दौड़ाया जा रहा है। अधिकांश वाहन नियम पर खरे नहीं हैं। बावजूद इसके संचालन की अनुमति मिली हुई है।                         

अभिभावक हों जागरूक
स्कूली संचालकों को छूट मिलने में अभिभावकों की भी कमी है। अभिभावक लाडलों को ले जाने वाले वाहनों के बारे में जांच-पड़ताल नहीं करते हैं और न ही स्कूल से इनके फिटनेस की जानकारी लेते हैं। यदि अभिभावक वाहन लगाने से पहले पूरी तरह तस्दीक कर लें तो काफी हद तक सुधार हो सकता है।                 

यह हैं फिटनेस के मानक                        
स्कूली वाहनों में वैन, बस अथवा अन्य किसी वाहन में गैस किट नहीं लगाई जा सकती है। मेडिकल फर्स्ट एंड बॉक्स होना चाहिए। वाहन में आगे-पीछे और दोनों तरफ साइड में मानक रिफ्लेक्टर लगे हों, इंडीकेटर लाइट सही होनी चाहिए। हेल्पलाइन नंबर, चालक, कंडक्टर एवं स्कूल का नाम, नंबर लिखा होना भी आवश्यक है।
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