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एक तार से पता चला था पति की शहादत का

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वर्ष 1962 के युद्घ में शहीद हुए दूधाहेडी निवासी लांसनायक रामदास। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
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लद्दाख में रामदास ने दिया था वीरता से बलिदान
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मंसूरपुर। चीन के खिलाफ 1962 में बहादुरी और वीरता से जंग लड़ने वालों में दूधाहेड़ी के लांसनायक रामदास का नाम भी शामिल है। वह लद्दाख में चीनी सैनिकों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। आज भी लोग उनकी वीरगाथा को याद करते हैं। हालांकि वह अपने पति के अंकित दर्शन नहीं कर पाई, क्योंकि शहीद होने के बाद उनका शव गांव में नहीं पहुंच पाया था।
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शहीद की पत्नी वीरांगना महावीरी बताती हैं कि 1962 में उनके पति की ड्यूटी भारत चीन बॉर्डर लद्दाख में थी। उस समय उनकी 24 वर्ष थी। जब उनके पति शहीद हुए बेटी मिथलेश मात्र 10 दिन की थी। उस समय टीवी नहीं थे गांव में कुछ के पास रेडियो था। रेडियो के द्वारा ही युद्ध के समाचार का पता लगता था। उन्हें पति की मृत्यु का समाचार तार के द्वारा मिला तथा छह महीने बाद उन्हें उनके कपड़े और कुछ जरूरी सामान मिला था। सरकार की तरफ से उनको पेंशन दी जा रही है और कचहरी रोड पर उन्हें एक दुकान आवंटित की गई थी। जब भारत चीन युद्ध के बारे में बात करते हैं तो चीन के प्रति गुस्सा होने लगती हैं, वह कहती हैं कि सरकार को सैनिकों की शहादत का बदला लेना चाहिए।
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