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Kanwar Yatra: शहीदों को समर्पित कांवड़, 411 दिन की अनोखी यात्रा, कहीं मां को कंधों पर बैठाकर निकले शिवभक्त

Wed, 05 Aug 2026 11:04 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर

सार

कांवड़ यात्रा इस बार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रभक्ति, मातृसेवा और पारिवारिक संस्कारों की मिसाल भी बन रही है। मुजफ्फरनगर में शहीद सैनिकों को समर्पित कांवड़, नेपाल तक घुटनों के बल 411 दिन की यात्रा पर निकले शिवभक्त, मां को कंधों पर बैठाकर यात्रा कराने वाले बेटे और पिता के साथ कांवड़ यात्रा कर रहीं बेटियां लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
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कांवड़ यात्रा 2026 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सावन की कांवड़ यात्रा में इस बार आस्था के साथ राष्ट्रभक्ति, मातृभक्ति और पारिवारिक संस्कारों की अनूठी तस्वीरें सामने आ रही हैं। मुजफ्फरनगर के विभिन्न कांवड़ मार्गों पर ऐसे शिवभक्त दिखाई दिए, जिन्होंने अपनी यात्रा को समाज के लिए प्रेरणा बना दिया। 

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हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रहे शिवभक्तों के बीच आस्था और राष्ट्रभक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला। हरियाणा के पलवल जिले के गांव मीरपुर कौराली के युवा अपने गांव के तीन जांबाज शहीद सैनिकों की स्मृति को समर्पित कांवड़ लेकर खतौली से गुजरे।

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गांव मीरपुर कौराली के शिवभक्तों देवेंद्र, वीरपाल, वीरेंद्र, लक्ष्मण, संजय, कमल और रविंद्र हरवंश ने बताया कि यह कांवड़ उन वीर सपूतों को समर्पित है। इन शहीदों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए थे।

शिवभक्तों ने एक अगस्त को यह कांवड़ उठाई थी। वे भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। साथ ही उनके त्याग, बलिदान और देशभक्ति की भावना को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प भी लेंगे। यह यात्रा आस्था और राष्ट्रभक्ति का एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

अमर शहीदों को श्रद्धांजलि
यह कांवड़ यात्रा गांव मीरपुर कौराली के तीन अमर शहीदों की याद में निकाली गई है। इनमें धर्मपाल चेची वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में 13 दिसंबर को शहीद हुए थे। धर्मवीर चेची वर्ष 2003 में कश्मीर में 24 अगस्त को मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हुए। खड़क सिंह लद्दाख में वर्ष 2007 में 11 दिसंबर को शहीद हुए थे।

कांवड़ यात्रा - फोटो : अमर उजाला
मेरठ के हरपाल नाथ महाराज हरिद्वार से घुटनों के बल गंगाजल लेकर कांवड़ यात्रा पर निकले हैं। वह पहले सम्भलहेड़ा मंदिर और इसके बाद नेपाल स्थित उज्जैन महाकाल पशुपतिनाथ मंदिर में जलाभिषेक करेंगे।

हरपाल नाथ महाराज एक छोटी ट्रॉली में गंगाजल व सामान रखे हैं। उसे पीठ से बांधकर खींच रहे हैं। उनकी कांवड़ यात्रा 411 दिन की है। महाराज 23 जुलाई को हरिद्वार से घुटनों के बल लगभग 30 लीटर गंगाजल लेकर चले हैं।

भोपा कांवड़ सेवा शिविर गंग नहर पुल पहुंचे शिव भक्त हरपाल नाथ महाराज ने बताया कि वह नेपाल स्थित उज्जैन के महाकाल पशुपतिनाथ मंदिर में जाकर जलाभिषेक करेंगे। वह प्रतिदिन पांच से सात किलोमीटर तक की दूरी तय कर लेते हैं।

हरपाल नाथ महाराज ने थर्माकोल के कुछ हिस्सों को घुटनों का कवर बनाया है। हाथ में भी थर्माकोल के टुकड़े लेकर चलते हैं। थर्माकोल का इस्तेमाल उसे समय करते हैं जब वह अपनी यात्रा पर चलते हैं। उनका कहना है कि सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने थर्माकोल का इस्तेमाल किया है। इसके बाद भी हाथों और घुटनों में निशान हैं।

कांवड़ यात्रा - फोटो : अमर उजाला
मां को कंधों पर बैठाकर करा रहे कांवड़ यात्रा 
कांवड़ यात्रा में लाखों शिवभक्त भगवान भोलेनाथ के प्रति अपनी अटूट आस्था का परिचय दे रहे हैं। कुछ ऐसे दृश्य भी सामने आ रहे हैं, जो भारतीय संस्कृति, मातृभक्ति और संस्कारों की मिसाल बन रहे हैं।

कांवड़ यात्रा मार्ग पर ऐसा नजारा देखने को मिला, जब पांच बेटे अपनी मां को कंधों पर बैठाकर हरिद्वार से गंगाजल लेकर कांवड़ यात्रा कराते हुए खतौली पहुंचे। जेवर के भुन्ना जाटान निवासी शिवभक्त लोकेश, रविंद्र, प्रवीण, संजय, रोहताश ने बताया कि उनकी माता वीरवती की इच्छा थी कि वह कांवड़ यात्रा करें। मां की इसी इच्छा को अपना सौभाग्य मानते हुए पांचों भाइयों ने उन्हें कंधों पर बैठाकर 31 जुलाई को हरिद्वार से गंगाजल लेकर यात्रा शुरू की।

यह उनकी पहली कांवड़ यात्रा है। बेटों का कहना है कि भगवान शिव से उनकी यह प्रार्थना है कि उनकी मां हमेशा स्वास्थ्य और दीर्घायु रहें। माता-पिता से बढ़ कर कोई सेवा नहीं होती और मां की इच्छा पूरी करना उनके जीवन सबसे बड़ा सौभाग्य है। बोल बम के जयकारों के साथ शिवभक्त अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए। 
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कांवड़ यात्रा - फोटो : अमर उजाला
शिवभक्ति में पिता संग चल रही बेटियों की आस्था
मुजफ्फरनगर। सावन की कांवड़ यात्रा में इस बार आस्था के साथ पिता और बेटी के रिश्ते की भावुक तस्वीरें भी देखने को मिल रही हैं। कांवड़ मार्ग पर बड़ी संख्या में ऐसे परिवार नजर आ रहे हैं, जहां पिता अपनी बेटियों के साथ यात्रा कर रहे हैं। यात्रा में बेटियां बराबर भागीदारी निभाने के साथ पिता का संबल बन रही हैं।

यात्रा के दौरान छोटी बेटियां पिता का हाथ थामे चल रही हैं, जबकि बड़ी बेटियां उनकी देखभाल कर हर कदम पर सहयोगी बन रही हैं। पिता के भोजन, ठहरने और दवाइयों का ध्यान रख रही हौसला बढ़ाती दिखाई दे रही हैं।

दिल्ली के मोहन गार्डन निवासी राजकुमार अपनी आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी प्रियंका के साथ कांवड़ यात्रा पर निकले हैं। उन्होंने बताया कि वह कई वर्षों से कांवड़ ला रहे हैं, लेकिन इस बार शुगर और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या के कारण बेटी ने उन्हें अकेले जाने नहीं दिया।

बेटी ने स्वयं साथ चलने की जिद की। वह पूरी यात्रा में समय पर दवा देती है, भोजन का ध्यान रखती है और हर कदम पर साथ रहती है। वह कहते हैं कि जब बेटी मेरा इतना ध्यान रखती है तो यात्रा की सारी थकान दूर हो जाती है।

दिल्ली निवासी राज अपनी तीन वर्षीय बेटी को ट्रॉली में साथ लेकर कांवड़ यात्रा कर रहे हैं। उनका कहना है कि बेटी अभी छोटी जरूर है, लेकिन वह चाहते हैं कि बचपन से ही उसमें साहस, अनुशासन और धैर्य जैसे संस्कार विकसित हों। कांवड़ यात्रा कठिन परिस्थितियों में संयम और संकल्प बनाए रखना सिखाती है। यही सीख आगे चलकर जीवन की चुनौतियों का सामना करने में काम आएगी।
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