मेरठ के हरपाल नाथ महाराज हरिद्वार से घुटनों के बल गंगाजल लेकर कांवड़ यात्रा पर निकले हैं। वह पहले सम्भलहेड़ा मंदिर और इसके बाद नेपाल स्थित उज्जैन महाकाल पशुपतिनाथ मंदिर में जलाभिषेक करेंगे।
हरपाल नाथ महाराज एक छोटी ट्रॉली में गंगाजल व सामान रखे हैं। उसे पीठ से बांधकर खींच रहे हैं। उनकी कांवड़ यात्रा 411 दिन की है। महाराज 23 जुलाई को हरिद्वार से घुटनों के बल लगभग 30 लीटर गंगाजल लेकर चले हैं।
भोपा कांवड़ सेवा शिविर गंग नहर पुल पहुंचे शिव भक्त हरपाल नाथ महाराज ने बताया कि वह नेपाल स्थित उज्जैन के महाकाल पशुपतिनाथ मंदिर में जाकर जलाभिषेक करेंगे। वह प्रतिदिन पांच से सात किलोमीटर तक की दूरी तय कर लेते हैं।
हरपाल नाथ महाराज ने थर्माकोल के कुछ हिस्सों को घुटनों का कवर बनाया है। हाथ में भी थर्माकोल के टुकड़े लेकर चलते हैं। थर्माकोल का इस्तेमाल उसे समय करते हैं जब वह अपनी यात्रा पर चलते हैं। उनका कहना है कि सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने थर्माकोल का इस्तेमाल किया है। इसके बाद भी हाथों और घुटनों में निशान हैं।
मां को कंधों पर बैठाकर करा रहे कांवड़ यात्रा
कांवड़ यात्रा में लाखों शिवभक्त भगवान भोलेनाथ के प्रति अपनी अटूट आस्था का परिचय दे रहे हैं। कुछ ऐसे दृश्य भी सामने आ रहे हैं, जो भारतीय संस्कृति, मातृभक्ति और संस्कारों की मिसाल बन रहे हैं।
कांवड़ यात्रा मार्ग पर ऐसा नजारा देखने को मिला, जब पांच बेटे अपनी मां को कंधों पर बैठाकर हरिद्वार से गंगाजल लेकर कांवड़ यात्रा कराते हुए खतौली पहुंचे। जेवर के भुन्ना जाटान निवासी शिवभक्त लोकेश, रविंद्र, प्रवीण, संजय, रोहताश ने बताया कि उनकी माता वीरवती की इच्छा थी कि वह कांवड़ यात्रा करें। मां की इसी इच्छा को अपना सौभाग्य मानते हुए पांचों भाइयों ने उन्हें कंधों पर बैठाकर 31 जुलाई को हरिद्वार से गंगाजल लेकर यात्रा शुरू की।
यह उनकी पहली कांवड़ यात्रा है। बेटों का कहना है कि भगवान शिव से उनकी यह प्रार्थना है कि उनकी मां हमेशा स्वास्थ्य और दीर्घायु रहें। माता-पिता से बढ़ कर कोई सेवा नहीं होती और मां की इच्छा पूरी करना उनके जीवन सबसे बड़ा सौभाग्य है। बोल बम के जयकारों के साथ शिवभक्त अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए।
शिवभक्ति में पिता संग चल रही बेटियों की आस्था
मुजफ्फरनगर। सावन की कांवड़ यात्रा में इस बार आस्था के साथ पिता और बेटी के रिश्ते की भावुक तस्वीरें भी देखने को मिल रही हैं। कांवड़ मार्ग पर बड़ी संख्या में ऐसे परिवार नजर आ रहे हैं, जहां पिता अपनी बेटियों के साथ यात्रा कर रहे हैं। यात्रा में बेटियां बराबर भागीदारी निभाने के साथ पिता का संबल बन रही हैं।
यात्रा के दौरान छोटी बेटियां पिता का हाथ थामे चल रही हैं, जबकि बड़ी बेटियां उनकी देखभाल कर हर कदम पर सहयोगी बन रही हैं। पिता के भोजन, ठहरने और दवाइयों का ध्यान रख रही हौसला बढ़ाती दिखाई दे रही हैं।
दिल्ली के मोहन गार्डन निवासी राजकुमार अपनी आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी प्रियंका के साथ कांवड़ यात्रा पर निकले हैं। उन्होंने बताया कि वह कई वर्षों से कांवड़ ला रहे हैं, लेकिन इस बार शुगर और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या के कारण बेटी ने उन्हें अकेले जाने नहीं दिया।
बेटी ने स्वयं साथ चलने की जिद की। वह पूरी यात्रा में समय पर दवा देती है, भोजन का ध्यान रखती है और हर कदम पर साथ रहती है। वह कहते हैं कि जब बेटी मेरा इतना ध्यान रखती है तो यात्रा की सारी थकान दूर हो जाती है।
दिल्ली निवासी राज अपनी तीन वर्षीय बेटी को ट्रॉली में साथ लेकर कांवड़ यात्रा कर रहे हैं। उनका कहना है कि बेटी अभी छोटी जरूर है, लेकिन वह चाहते हैं कि बचपन से ही उसमें साहस, अनुशासन और धैर्य जैसे संस्कार विकसित हों। कांवड़ यात्रा कठिन परिस्थितियों में संयम और संकल्प बनाए रखना सिखाती है। यही सीख आगे चलकर जीवन की चुनौतियों का सामना करने में काम आएगी।