बैंक में लगी ग्राहकों की भीड़।
- फोटो : अमर उजाला
काले धन को सफेद करने के लिए बैंकों के निष्क्रिय खातों में बड़ा खेल होने का अंदेशा है। जिले के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों के बैंक खातों पर आरबीआई और आयकर विभाग की निगाहें टिकी हैं। 500 और 1000 रुपये की नोटबंदी के बाद बैंककर्मियों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर नगदी बदली गई है।
बड़े नोट प्रतिबंधित किए जाने के बाद काले धन को स्वीकृत मुद्रा में तब्दील करने के लिए हर हथकंडे अपनाए गए हैं। जिले के जनधन ख्रातों में जमा की गई करोड़ों की रकम कालेधन की असलियत दर्शा रही है। आयकर विभाग बड़ी रकम के लिए इस्तेमाल किए गए जन-धन खातों की बारीकी से जांच में जुटा है। बैंकों के निष्क्रिय खातों में भी 500 और 1000 के नोटों को जमा कर सफेद करने का अंदेशा गहरा रहा है।
चरथावल के बुड्ढाखेड़ा गांव के किसान जनक सिंह ने जिस तरीके से अपने खाते में 87 लाख की रकम दिखाए जाने का मामला उठाया है, उससे दूरस्थ ग्रामीण इलाके में कार्यरत बैंकों और ग्राहक सेवा केंद्रों के खातों में भी खेल किए जाने का सच सामने आ सकता है। ग्रामीण बैंक खाते खोलने के बाद उन्हें संचालित नहीं कर पाते। सरकार की मुआवजा राशि और बच्चों के लिए मिलने वाली छात्रवृत्ति आदि के लिए किसान और मजदूर अपने खाते खुलवाते हैं।
खातों से नगदी का लेनदेन उनकी दिनचर्या में शामिल नहीं होता। बुड्ढाखेड़ा के ज्यादातर ग्रामीणों के खाते निरंतर संचालित नहीं हैं। ऐसे ही एक-दो साल से निष्क्रिय खातों की गहनता से जांच की संभावना बढ़ गई है। बैंककर्मियों पर 30 प्रतिशत के कमीशन पर प्रतिबंधित नोटों को बदलने के आरोप लग रहे हैं। जिले की सभी बैंक शाखाओं में ऐसे हजारों खाते हैं, जिनमें कोई लेनदेन हाल के सालों में नहीं हुआ है।
नोटबंदी के बाद बैंकों पर पिछले 36 दिनों में ग्राहकों की पासबुक तक पूरी नहीं की जा रही हैं, क्योंकि बैंक स्टाफ कैश वितरण और भीड़ को संभालने में ही व्यस्त है। खातों का दुरुपयोग न हो जाए, इसके लिए उपभोक्ता बैंक पासबुक को पूरा कराने की कोशिश में लगे हैं। लीड बैंक प्रबंधक शशि कुमार जैन कहते हैं कि यदि किसी के खाते में ऐसी कोई रकम आती है तो वह बैंक अधिकारियों की जानकारी में लाएं। जांच कराकर स्पष्ट स्थिति सामने लाई जाएगी।