जनपद में एक साल के भीतर 14 हजार से अधिक बच्चों में देखने और सुनने की शक्ति कम पाई गई है। यानी जो बीमारी 55 साल की उम्र में आनी चाहिए, वह बचपन में ही आ रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएससी) के तहत जिले में कराए गए सर्वे में यह सच सामने आया है। टीम ने तीन हजार से अधिक प्राइमरी, प्राथमिक और आंगनबाड़ी केंद्रों पर जांच-पड़ताल के बाद यह आंकड़े जुटाए हैं।
एनएचएम के तहत देशभर में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसमें बच्चों में होने वाली अनेक बीमारियों की जानकारी जुटाई जा रही हैं। मुजफ्फरनगर में भी आरबीएससी की टीम लगाई गई है, जो क्षेत्रों में घूमकर बच्चों की बीमारियों की जानकारी जुटा रही है। एक साल में टीम ने जनपद और आसपास के क्षेत्रों में स्थित 3014 आंगनबाड़ी केंद्र, प्राइमरी, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों का दौरा किया।
प्रत्येक ब्लॉक में दो चिकित्सकों के अंडर में टीम ने कार्य किया। निरीक्षण में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। दस साल से कम उम्र के 14,385 बच्चे ऐसे मिले हैं, जिनकी आंखों की दूरदृष्टि (कुछ ही दूरी) और कान से सुनने की क्षमता कमजोर पाई गई है। आंखों में धुंधलापन और भैंगापन पाया गया है। टीम ने जिला स्तर पर 10,784 बच्चों का उपचार कराया है। साथ ही 3601 बच्चों की अनेक बीमारियों का उपचार करने में जनपद का स्वास्थ्य महकमा दम तोड़ गया।
इनमें अधिकांश को एलएलआरएम मेडिकल कालेज मेरठ रेफर किया गया। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के जिला मैनेजर गुरदीप बिरला ने बताया कि बच्चों में बीमारियों के 38 प्रकार के लक्षणों का पता लगाया जा रहा है। यह ऐसे लक्षण हैं, जो बच्चों को आगे चलकर अपंग या कुपोषित कर सकते हैं। सर्वे में बड़ी संख्या में क्षेत्रों में बच्चे बीमार पाए गए हैं।
खान-पान और जन्मजात बीमारी
मुजफ्फरनगर। सर्वे में टीम ने पाया कि अनेक बच्चों में खान-पान की कमी या गलत आहार लेने से बीमारी हुई है। जबकि अधिकांश बच्चों में आंख, कान और अन्य बीमारियां जन्मजात रूप से पाई गई हैं। यानि बच्चे के परिवार में मां अथवा पिता को आंख, कान, दिल और हाथ-पैरों के साथ त्वचा संबंधी रोग मिले हैं। इन बीमारियों के लक्षण खून के माध्यम से बच्चों में भी पहुंच गए।
डीईआईसी की दरकरार
मुजफ्फरनगर। जनपद में डिस्ट्रिक अर्ली इंटरवेशन सेंटर (डीईआईसी) यानि जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र नहीं है। ताकि बच्चों की बीमारियों को शुरुआती दौर से ही काबू किया जा सके। डीईआईसी में उच्च कोटि के चिकित्सक और हाईटेक मशीन होती है। केंद्र और प्रदेश सरकार ने गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, अलीगढ़ और लखनऊ में डीईआईसी बनाने को पैसा जारी केंद्र बनाने के लिए हरी झंडी दे दी है।