भारत बंद के दौरान दलित युवकों की उग्र भीड़ आने पर व्यापारी अफसरों और 100 नंबर पर डायल करते रहे, लेकिन बचाने कोई नहीं आया। प्रशासन को जब पहले से ही पता था कि बंद का एलान है तो उसने व्यवस्था क्यों नहीं की। जिला पंचायत के सभागार में उक्त बातें कहकर व्यापारियों ने अफसरों के सामने अपना रोष जताया।
जिला पंचायत के सभागार में आयोजित समारोह के दौरान संयुक्त उद्योग व्यापार मंडल ने डीएम राजीव शर्मा और एसएसपी अनंतदेव के सामने बंद के दौरान हुई हिंसा की घटनाएं रखी। व्यापारियों ने एसडी मार्केट में तोड़फोड़ की बात बताई, वहीं पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की कार्यप्रणाली की पोल भी खोली।
व्यापारियों ने बताया कि वे लोग फोन करते रहे, लेकिन अफसरों के फोन नहीं उठे। 100 नंबर से भी कोई रेस्पांस नहीं मिला। किसी तरह कोतवाल ने फोन उठाया तो पुलिस एसडी मार्केट पर आई और बड़ी घटना होने से बची। रेवतीनंदन सिंघल ने कहा कि बंद का एलान पहले ही हो चुका था, प्रशासन ने कोई इंतजाम नहीं किए। शहर में हिंसक भीड़ ने भय का माहौल पैदा किया।
संजय मित्तल और दीपक वर्मा ने तो यहां तक कहा कि व्यापारियों को उपद्रवियों से निपटने के लिए अपनी दुकानों पर लाठी डंडे रखने चाहिए। प्रमोद मित्तल, श्रीमोहन तोयल ने अवांछनीय तत्वों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की। अशोक बाठला और अमित गर्ग ने कहा कि जब तक प्रशासन सुरक्षा की गारंटी नहीं लेता, तब तक व्यापारी भयमुक्त होकर व्यापार नहीं कर सकता।
कृष्ण गोपाल मित्तल और राहुल वर्मा ने प्रशासन की व्यवस्था पर सीधे सवाल दागे। व्यापारियों के बीच में डीएम राजीव शर्मा और एसएसपी अनंतदेव ने माना कि वे भीड़ का अंदाजा नहीं लगा सके और न ही मंशा समझ सके, प्रशासन से चूक हुई है। पूर्व विधायक अशोक कंसल, रमेश खुराना, रविंद्र जैन, राकेश कंसल, अनिल नामदेव, श्याम सिंह सैनी, सुनील तायल, दीपक नारंग, विशाल गर्ग, अभय गुप्ता आदि रहे।
उपद्रव और बवाल के दौरान किसने चलाई गोली
भारत बंद के दौरान हिंसक हुई भीड़ पर गोलियां चलाने को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। आखिर इस पूरे प्रकरण में कोई न कोई पक्ष अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए झूठ बोल रहा है। अब पीड़ित पक्ष झूठ बोल रहा है कि पुलिस प्रशासन इसकी पुष्टि जांच में होगी।
पुलिस अफसर दावा कर रहे हैं कि पुलिस ने भीड़ पर फायरिंग नहीं की है। पुलिस ने फायरिंग नहीं की है तो गादला के अमरेश की मौत किसकी गोली से हुई। वहीं, अमरेश के परिजनों का आरोप है कि पुलिस की गोली से ही उसकी मौत हुई है अमरेश के साथ ही रेलवे के गैंगमेन प्रताप और दलित युवक विक्रांत को भी गोली लगी है।
भारत बंद के दौरान हिंसक हुई भीड़ पर फायरिंग को लेकर पुलिस सवालों के घेरे में खड़ी हो गई है। एसपी सिटी ओमवीर सिंह का दावा है कि पुलिस ने बवाल के दौरान कोई फायरिंग नहीं की है। उनका दावा है कि अमरेश की मौत बलवाईयों की गोली से हुई है। रेलवे स्टेशन पर बवाल के दौरान 15 मिनट तक फायरिंग की आवाज आती रही।
फायरिंग में रेलवे का गैंगमेन प्रताप सैनी और दलित युवक विक्रांत भी घायल हुए हैं। जितनी दूरी से गोली लगी है, तमंचे से इतनी दूर गोली नहीं लग सकती। मृतक गादला के अमरेश का भाई इंद्रेश और मां नरेशो का कहना है कि उसकी मौत पुलिस की गोली से हुई है।
उनका यह भी कहना है कि अमरेश शहर में मजदूरी करता था। सोमवार को भी वह घर से रोटी बांधकर ले गया था। अमरेश को गोली किस स्थान पर मारी गई, उन्हें यह मालूम नहीं है। घायल अमरेश को पुलिस ही अस्पताल लेकर गई, लेकिन गोली छाती पर ऐसी जगह लगी थी, जहां वह लगते ही मर गया। परिजनों का आरोप है कि पुलिस घटना को छिपाती रही।
डीआईजी शरद सचान का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अमरेश को 32 बोर की गोली लगना सामने आया है। वह पुलिस की गोली से नहीं मरा है। किसी छोटे वेपन से गोली चलाई गई है। पुलिस के दावे और अमरेश के परिजनों के आरोप से मामला उलझ गया है। पुलिस की कहानी भी सवालों के घेरे में आ रही है।
वीडियो फुटेज में भीड़ के पास तमंचा ढूंढ रही पुलिस
मुजफ्फरनगर। उपद्रव और बवाल के दौरान दलित युवकों के हाथों में लाठी और डंडे तो दिखाई दिए, लेकिन तमंचा किसी के भी हाथ में दिखाई नहीं दिया। पुलिस ने यह आरोप तो लगा दिया कि अमरेश को लगी गोली भीड़ की तरफ से ही चली होगी, लेकिन इसे सिद्ध करने में पुलिस को पसीने आ रहे हैं।
किसी भी फोटोग्राफ में किसी कार्यकर्ता के हाथ में तमंचा नहीं है। गोली चलाता हुआ भी कोई कार्यकर्ता दिखाई नहीं दिया। टकराव का जिस तरह का माहौल रेलवे स्टेशन पर बना था, यदि तमंचे होते तो दलित युवक उनसे गोली चलाते भी दिखते। पुलिस अपना दामन बचाने के लिए वीडियो फुटेज में किसी कार्यकर्ता के हाथ में तमंचा दिख जाए तो उस पर केस मढ़ दें। ऋअभी तक पुलिस को ऐसा कोई सबूत नहीं मिल पाया है।