कोरोना से घटी, घेवर की डिमांड
मुजफ्फरनगर, बुढ़ाना। सावन में मिठाई की दुकान पर कस्बे की प्रसिद्ध बालूशाही व घेवर की खरीददारी के लिए ग्राहकों की लाईन नहीं टूटती थी। लेकिन इस बार कोरोना ने मिठाई का धंधा चौपट कर दिया। कस्बे में बालूशाही व घेवर के खरीददार नहीं है। दुकानदारों का कहना है कि परिवार के खर्चे व बचत तो दूर की बात है, दुकान पर काम करने वालों के खर्चे भी पूरे नहीं हो रहे हैं।
कस्बे से लेकर देहात के लोग सावन में सबसे अधिक पसंद घेवर की मिठाई को करते हैं। कस्बे की प्रसिद्ध देशी घी की बालूशाही व अन्य मिठाइयों का घेवर के बाद नंबर आता है। कस्बे में तीन प्रकार का घेवर बनाया जाता है। सादा घेवर, मावा, रबड़ी वाला घेवर तथा देशी घी से निर्मित केसर वाला घेवर बनाया जाता है। देशी घी से निर्मित केसर वाला घेवर कस्बे में कुछ ही दुकानों पर ही बनाया जाता है। रबड़ी के घेवर की सबसे अधिक मांग रहती है। कोरोना महामारी के चलते कस्बा हो चाहे देहात के लोग बाजार का बना सामान खाना पसंद नहीं कर रहे है।
सांवरिया स्वीट्स के मालिक अंशुल गोयल व ओमप्रकाश गोयल, महेंद्रा स्वीट्स के लाला महेंद्र, हुकम स्वीट्स के मालिक विनय आदि ने बताया कि प्रतिवर्ष मिठाई की मांग बढ़ती जा रही थी। सावन में तो घेवर की बिक्री पूरे साल का खर्च निकाल देते थी। कोरोना महामारी के कारण मिठाई कारोबारी की लागत तक नहीं निकल पा रही है। घेवर की मांग पिछले वर्षों के मुकाबले मात्र 20-25 प्रतिशत रह गई है। दुकान पर काम करने वाले कारीगरों व अन्य लड़कों के खर्चे भी नही निकल पा रहे है। लाला महेंद्र ने बताया कि मजबूरी में आधे कारीगरों को हटा दिया गया है। दुकान से घर के खर्चे पूरे करना व कमाई करना तो अब दूर की बात हो गई है।
सावन की कोथली पर मिठाई नहीं नगदी भेज रहे मायके वाले
बुढ़ाना। सावन में देहात से लेकर कस्बे व शहरों में बेटियों के मायके व ससुराल वालों द्वारा कोथली भेजने का प्रचलन है। कोथली पर मिठाई में अधिकांश घेवर भेजने का प्रचलन है। इस महीने में घेवर की मांग बड़े पैमाने पर होती थी। लेकिन इस बार मांग नहीं रह गई है। ग्रामीण ओमप्रकाश मलिक, मुकेश मलिक, सोमपाल मलिक व संजय शर्मा आदि ने बताया कि देहात में सभी लोग अब कोथली में नगदी भेज रहे हैं। बाजार से मिठाई व अन्य सामान खरीदना खतरे से खाली नही है।