क्राइम कैपिटल से अपराध के धब्बे मिटने लगे हैं। बदमाशों के खिलाफ चले पुलिस के अभियान से खाकी का इकबाल दिख रहा है। कुख्यात अपराधी भी खौफ के साए में हैं। दो दशक में पहली बार ऐसा हुआ है कि जब जनवरी माह में जिले में कोई मर्डर, डकैती और अपहरण की वारदात नहीं हुई। योगी सरकार आने के बाद जिले में 143 मुठभेड़ हुईं, जिनमें पांच बदमाशों को एनकाउंटर में मार गिराया गया। 291 अपराधी गोलियों से घायल कर सलाखों के पीछे डाल दिए गए हैं।
एक वक्त ऐसा भी था, जब पूरे देश में मुजफ्फरनगर को अपराध की राजधानी कहा जाता था। अपहरण उद्योग बन चुका था और करोड़ों की रंगदारी वसूली जाती थी। जेल में बैठे आकाओं के इशारे पर हत्याएं की जाती थीं। जुर्म की वजह से जिले में औद्योगिक और व्यावसायिक विकास उम्मीद के अनुरूप नहीं हो पाया।
व्यापारियों, भट्ठा स्वामियों और उद्यमियों का पलायन बढ़ा। बीते करीब 20 साल में पहली बार चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। जनवरी माह में अबकी बार कोई न हत्या हुई, न कोई अपहरण। यही कारण रहा कि रंगदारी वसूली और डकैती का कोई मुकदमा जिले में दर्ज नहीं हुआ। अगर पिछले साल के आंकड़ों पर गौर करें तो डकैती की एक, हत्या की नौ, अपहरण की छह और लूट की पांच वारदातें हुई थीं।
ऐसे ही वर्ष 2016 में हत्या की पांच, अपहरण की दो और लूट की तीन वारदात हुईं। एक माह में जिले में दस से ज्यादा हत्याएं होना आम बात थी। वर्ष 2012 से अब तक के आंकड़े भी यही दर्शा रहे हैं। वैसे भी मुजफ्फरनगर में एक साल में औसत सवा सौ से डेढ़ सौ तक मर्डर के केस थानों में पंजीकृत हो जाते हैं।
बदले मौजूदा हालात के लिए कई कारण अहम हैं। योगी सरकार ने अपराध पर शिकंजा कसने की मुहिम छेड़ी और पुलिस ने खोए इकबाल को पुन: कायम किया। बदमाशों को पैरों में गोली मारकर लंगड़ा करने का फार्मूला भी कारगर साबित हुआ। जिला कारागार में 291 अपराधी पहुंच चुके हैं, इनमें 32 के पैरों में गोली लगी थी।
कई अपराधी तो जीवन भर के लिए लंगड़े हो गए। सहारनपुर रेंज में मुजफ्फरनगर में 143 और शामली में 51 पुलिस मुठभेड़ हो चुकी हैं। अभी तक दोनों जिलों में दस बड़े अपराधी ढेर किए जा चुके हैं। बदमाशों से मुठभेड़ में 20 से ज्यादा पुलिसकर्मी भी घायल हुए।
एसएसपी अनंत देव तिवारी के नेतृत्व में पुलिस बल ने पूरे जिले में बदमाशों के खिलाफ गहनता से अभियान चलाया, जिसका सुखद नतीजा सामने है। जेल से फर्जी सिमों के जरिए धमकाने और वसूली करने के मामले थम गए हैं। पहले जेल में बैठे कई बड़े अपराधियों ने अपने शूटरों से दिनदहाड़े हत्याएं कराईं।
खाकी के बुलंद हौसले का असर यह है कि थानों में मुकदमों की संख्या भी घट रही है।रने वाले माफिया पुलिस के रडार पर हैं। ये ऐसे अपराधी हैं, जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने से भी लोग डरते हैं। जिले में ऐसे अपराधी सुशील मूंछ, संजीव जीवा, अजीत मखियाली, मीनू त्यागी, सुनील राठी के गुर्गे सक्रिय हैं। ये सब पुलिस के निशाने पर हैं। जल्द ही इनके खिलाफ कठोर कार्रवाई को लेकर अभियान चलेगा।