प्रीति की डिजाइन की गई साड़ी
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शादी के बाद पति हेमंग पारीक के साथ मुंबई शिफ्ट हो गईं। यहीं से जीवन फिर बदलना शुरू हुआ। इंजीनियरिंग छोड़कर साड़ी की कारीगरी में हाथ आजमाने का फैसला किया। लेकिन कोरोना काल के बाद जब वह अपनी ससुराल कोटा पहुंची तो यहां आर्थिक तौर पर कारीगर टूट चुके थे। समय पर भुगतान नहीं होने की आम समस्या थीं।
कंपनी सोनचिरैया बनाकर कारीगरों को प्रोत्साहित किया और प्रत्येक बुधवार को उन्हें भुगतान दिया गया। कारीगर संतुष्ट हुए तो काम बढ़ने लगा। साड़ी में फूल पत्ती के बजाए एतिहासिक धरोहर और राजस्थान की कला को संजोने की पहल की, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया।
सोनचिरैया ही क्यों
असल में सोनचिरैया एक हस्तनिर्मित महिला लक्जरी कपड़ों का ब्रांड है, जिसने कैथून के विशेषज्ञ शिल्पकारों के साथ मिलकर ज़री की कला को पुनर्जीवित करने का कार्य शुरू किया। कैथून के कारीगर सदियों से इस पारंपरिक ज़री बुनाई में महारत रखते हैं।
तीन महीने से भी अधिक समय लगाकर बनाई जाने वाली ये साड़ियां भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की जीवंत मिसाल हैं। प्रीति सिंह बताती हैं कि कलात्मक विरासत को संजोने के लिए दादा से सुनी सोनचिरैया की कहानियां हमेशा मन में बसीं थी, ऐसे में जब कंपनी बनाई तो यह नाम रखने का फैसला किया।
प्रीति की साड़ी पहने टीना अंबानी
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