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बेबस की मौत पर भारी सिस्टम की ‘महिमा’

Sat, 18 Feb 2017 11:59 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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गमजदा मां संजू देवी और बहन का आईकार्ड लिए भाई अमित। - फोटो : अमर उजाला
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मुजफ्फरनगर।  कानून के हिसाब से पुलिस ग्रेजुएशन की छात्रा महिमा की मौत को भले ही हत्या न माने, लेकिन यह दबंगई के आगे सिस्टम की हत्या है, नौकरशाही का नकारापन है। मुफलिसी से जूझते परिवार की बेटी कुछ बनना चाहती थी, कुछ करना चाहती थी। किसी ने सोचा भी नहीं था कि बेटी को इस तरह जान खोनी पड़ेगी। 
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न्याय किस तरह अफसरों की चौखट पर दम तोड़ देता है, यह बीकॉम की स्टूडेंट महिमा से बेहतर कौन जान सकता है। एक हफ्ते तक वह अपनी मां संजू के साथ कहां-कहां नहीं गई। उसने खुद अपने पिता और भाई की रिहाई के लिए खुद ही तीन पन्नों का प्रार्थना पत्र लिखा। उसे लगता था कि थाने पर जब सुनवाई नहीं होती तो अफसरों के यहां न्याय मिलता है।

14 फरवरी को महिमा अपनी मां के साथ एसएसपी आफिस पहुंची। फरियादियों की लंबी लाइन पार कर बड़े साहब तक पहुंचने का मौका मिला। उसने अपनी दरख्वास्त एसएसपी को दी। आश्वासन मिला, घर जाओ कार्रवाई होगी। तहरीर में जिक्र है कि जब वह मां-बेटी घर लौट रही थीं, तो टेंपो से उतरते वक्त दबंगों ने उन्हें रोक लिया। धमकी दी कि यदि कल सुबह दस बजे तक साढ़े चार लाख रुपये नहीं मिले तो अंजाम बुरा होगा। दबंगों की दहशत से बेटी गुमसुुम हो गई। खौफ का आलम यह रहा कि घर में दो दिन तक चूल्हा नहीं जला। 
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दबंगों ने घर पर पहुंचना शुरू कर दिया। तहरीर मंडी कोतवाली पहुंची तो समझौते का दबाव पडने लगा। इन चक्करों में न पड़ो, तहरीर वापस ले लो। महिमा की मौत सिस्टम का ऐसा थोथरापन है, जिससे समाज
में भय का माहौल पनपता है। यदि अफसरों ने मां-बेटी की पहली तहरीर पर ही ध्यान दिया और आरोपियों पर शिकंजा कसा जाता तो एक मासूम बेटी बेमौत न मारी जाती। कानून के हिसाब से भले ही यह सुसाइड हो लेकिन कोई तो है, जो इसका जिम्मेदार है। बकौल मां, मेरी बेटी गरीबी से नहीं डरी। वह पढ़-लिखकर परिवार का सहारा बनना चाहती थी। उसकी सीए बनने की इच्छा थी। 
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