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Muzaffarnagar News: श्रीमद्भागवत का गवाह बरगद अब बना विरासत वृक्ष

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मुजफ्फरनगर। श्रीमद्भागवत कथा के गवाह और महाभारतकाल का इतिहास समेटे शुकतीर्थ आश्रम का वटवृक्ष अब विरासत वृक्ष बन गया है। वन विभाग ने पुराने बरगद का चयन किया है। जिले में कुल 11 पुराने वृक्षों का चयन विभाग की ओर से किया गया है।
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प्राचीन संस्कृति और इतिहास को संजोने के लिए प्रदेश सरकार ने विरासत वृक्ष के चयन का अभियान शुरू किया गया था। वन विभाग की डायरी में जिन ऐतिहासिक वृक्षों का चयन किया गया है, उनमें महर्षि श्री शुकदेव की अमर कथा का साक्षी बरगद भी शामिल है। शुकतीर्थ के शुकदेव आश्रम में स्थित यह पेड़ महाभारत का इतिहास समेटे है।
मोरना, जानसठ समेत जिले के करीब 11 पुराने पेड़ों को विरासत वृक्ष के लिए प्रस्तावित किया गया था, जिनमें शुकतीर्थ के बरगद को शामिल कर लिया गया है। यह बरगद श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। शुकतीर्थ पहुंचने वाले श्रद्धालु वटवृक्ष के दर्शन जरूर करते हैं।
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इनसेट
विरासत वृक्ष की श्रेणी में यह होंगे शामिल
प्रदेशभर में विरासत वृक्ष चुने जाएंगे। इनमें मुख्य रूप से अर्जुन, आम, पीपल, इमली, कुसुम, गूलर, पाकड़, बरगद, जामुन, नीम और शीशम के वृक्ष चयनित किए जा रहे हैं।
शुकतीर्थ को श्रीमद्भागवत की जन्मभूमि एवं 68 तीर्थो में से सर्वश्रेष्ठ माना गया है। श्री शुकदेव आश्रम में स्थित प्राचीन अक्षय वट परमहंस चूड़ामणि महर्षि श्री शुकदेव जी की अमर कथा का साक्षी है। वीर अर्जुन पौत्र और अभिमन्यु पुत्र हस्तिनापुर नरेश राजा परीक्षित को इसी वट वृक्ष के नीचे महामुनि शुकदेव ने पहली बार श्री मद्भागवत कथा सुनाई थी। शुकतीर्थ से मानव मात्र को ज्ञान, भक्ति, वैराग्य द्वारा ईश्वर प्राप्ति का मार्ग मिला।
- स्वामी ओमानंद, पीठाधीश्वर, भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम, शुकतीर्थ।

श्रद्धालु झुकाते हैं शीश, पेड़ की अमर कहानी
हस्तिनापुर नरेश राजा परीक्षित जंगल में शिकार के लिए गए थे। प्यास से व्याकुल होने पर उन्होंने महर्षि शमीक के गले में सांप डाल दिया और राजधानी लौट गए। भूल का अहसास होने पर गंगा के किनारे ऊंचे टीले पर पहुंचे, यहीं पर स्थित पुराने वटवृक्ष के नीचे महर्षिक शुकदेव से श्रीमद्भागवत कथा सुनी। बाद में तीन सदी के युगदृष्टा स्वामी कल्याण देव जी महाराज ने तीर्थ का जीर्णेाद्धार किया। ऐतिहासिक वटवृक्ष अब शुकदेव आश्रम में है और यहां श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
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