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भारतीय कुश्ती टीम के मुख्य कोच से बातचीत

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हंगरी में दमदार प्रदर्शन करेंगे भारतीय पहलवान
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मुजफ्फरनगर। जकार्ता एशियन गेम्स में कुश्ती में भारत ने दो स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीत कर अंतरराष्ट्रीय रेसलिंग में अपने दमखम की धाक जमाए रखी। वैसे ओलंपियन सुशील कुमार, साक्षी मलिक और पूजा ढांडा की हार से निराशा हुई। खैर भारतीय पहलवान कड़ी मेहनत और जोश के साथ हंगरी में चमकने की तैयारी में है, जहां अक्तूबर माह में वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप होगी। भारतीय कुश्ती टीम के मुख्य कोच एवं द्रोणाचार्य अवार्डी जुगमेंद्र पहलवान एशियाई खेलों में पहलवानों के प्रदर्शन से संतुष्ट हैं। ब्रांज मेडल विजेता दिव्या काकरान के सम्मान समारोह में आए जुगमेंद्र सेे बातचीत के प्रस्तुत है मुख्य अंश:
इंडोनेशिया के जकार्ता एशियाड में कुश्ती में भारत को मिले तीन पदक से अधिक की उम्मीद थी। कहां चूक हुई, जो ओलंपियन सुशील और साक्षी मलिक कोई पदक नहीं जीत पाए?
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- बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट की स्वर्णिम जीत लाजवाब रही। एशियाड के इतिहास में विनेश ने महिला कुश्ती में भारत को पहली बार स्वर्ण पदक दिलाया है। दिव्या काकरान का ब्रांज मेडल जीतना शानदार रहा। हार-जीत स्पर्धा का हिस्सा है। अनुभवी सुशील और साक्षी जकार्ता में अपना श्रेष्ठ नहीं दे पाए।
भारतीय महिला कुश्ती टीम में छह मल्ल जकार्ता गई थीं, जिनमें हरियाणा से पांच और यूपी से एक पहलवान शामिल थी। हरियाणा की अपेक्षा यूपी में कैसे बने कुश्ती का माहौल और मिले अधिक पहलवान?
- जब तक यूपी के स्टेडियम खाली रहेंगे, तब तक सूबे को एशियाड और ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ी कैसे मिलेंगे। मुजफ्फरनगर की ही बात करें तो ग्रामीण पृष्ठभूमि हरियाणा जैसी है, फिर भी खेलों में रुचि नहीं। हरियाणा में स्टेडियम में आने से भीड़ को रोकना पड़ता है। सोनीपत में कुश्ती कैंप में अक्सर ऐसा देखा गया है। खेलों में रुचि बढ़ने से ही माहौल बनेगा, तभी नए पहलवान भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचेंगे।
कुश्ती कड़ी मेहनत और प्रशिक्षण का खेल है। ज्यादातर ग्रामीण युवा ही रेसलिंग में आ रहे हैं। अखाड़े और दंगलों में सीखे गए दांवपेंच का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या फायदा होता है?
- रेसलिंग माइंड गेम है। मानसिक दृढ़ता, स्फूर्ति के बिना प्रतिद्वंद्वी पहलवान के दांव से बचना संभव नहीं है। रियो ओलंपिक में विनेश फोगाट को चोट लग गई थी, उसने दो साल के कठिन परिश्रम से अपने को उबारा और जकार्ता में गोल्ड जीता। गांव में अनुकूल वातावरण, शुद्ध आहार-व्यवहार है, जिसकी वजह से पहलवानी का माहौल मिलता है। अखाड़े और दंगलों में जितना अभ्यास करेंगे, उसका भी तकनीकी फायदा मिलता है। जकार्ता में दिव्या ने दंगल के दांव से ही कांस्य पदक जीता।
अगले माह हंगरी में वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप के लिए घोषित पुरुष और महिला टीमों में से किस मल्ल के पदक जीतने की आशा है। किन देशों से भारत को चुनौती मिलेगी?
- जल्द ही टीम में चुने गए पहलवान नेशनल कैंप में ट्रेनिंग को लौट आएंगे। फिर से कड़ा अभ्यास प्रारंभ होगा। जकार्ता एशियाड के मुकाबलों में हार की वीडियो से समीक्षा की जाएगी, ताकि खामियों को खत्म किया जाए। बजरंग पूनिया, सुशील कुमार, बागपत के संदीप तोमर, और विनेश व संगीता फोगाट, रीतू, पूजा ढांढा आदि हंगरी में दमदार प्रदर्शन करेंगे। चीन और जापान के पहलवानों से चुनौती मिलेगी। दक्षिणी कोरिया के कुछ पहलवान भी फाइटर है।
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कुश्ती का द्रोणाचार्य: एक परिचय
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नाम:जुगमेंद्र सिंह
पिता:चरण सिंह
गांव: बरवाला, शाहपुर
जिला: मुजफ्फरनगर
शिक्षा: ग्रेजुएट, सीसीएसयू मेरठ
सेवा: दिल्ली पुलिस से वर्ष 2017 में डीसीपी पद से सेवानिवृत्त
अवार्ड: वर्ष 1980 में अर्जुन पुरस्कार/ वर्ष 2008 में गुरु द्रोणाचार्य अवार्ड
उपलब्धियां: कॉमनवेल्थ गेम्स कनाडा(1978) तथा आस्ट्रेलिया (1982) में क्रमश: 62 किलोग्राम एवं 68 किलोग्राम में सिल्वर एवं गोल्ड मेडल। एशियन कुश्ती चैंपियनशिप भारत (1979) में रजत पदक, तेहरान (1983) में रजत एवं कांस्य पदक। कायदे आजम गेम्स पाकिस्तान (1980) में स्वर्ण पदक। विश्व रेसलिंग चैंपियनशिप मंगोलिया (1980) में रजत पदक। मास्को ओलंपिक खेलों में (1980) में 68 किलोग्राम में चौथा स्थान।
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