होली पर्व पर सिद्ध बाबा दूधाधारी से जुड़ी आस्था श्रद्धालुओं को फहीमपुर खुर्द खींच लाती है। सदियों से चली आ रही परंपरा में जिले के पांच गांव जुड़े हैं, जहां के ग्रामीण दुल्हेंडी के दिन दूध का इस्तेमाल नहीं करते हैं। इन गांव से दूध सिद्ध बाबा के समाधि मंदिर पर चढ़ता है। वहीं, भोग प्रसाद बनाकर भक्तों में वितरित किया जाता है।
खतौली ब्लाक के गांव फहीमपुर खुर्द में सिद्ध बाबा दूधाधारी गणेशजी महाराज का समाधि मंदिर है। होली के त्योहार पर समाधि स्थल पर श्रद्धालुओं का मेला लगता है। यह परंपरा कब से चली आ रही है, किसी को ज्ञात नहीं है। सदियों से जिले के पांच गांव के ग्रामीण आस्था और श्रद्धा के साथ दुल्हेंडी पर यहां आते हैं। फहीमपुर खुर्द, सिखेड़ा, शाहपुर, आदमपुर मौचड़ी, पिपलहेड़ा के ग्रामीण दुल्हेंडी को दूध का घरों में प्रयोग नहीं करते। तमाम दूध एकत्र कर फहीमपुर खुर्द गांव में सिद्ध बाबा की समाधि पर पहुंचता है, जहां बाबा को भोग के बाद दूधिया (मीठा दूध) का प्रसाद वितरित किया जाता है। अहम बात यह है कि इस परंपरा से जुड़े पांचों गांव अलग-अलग बिरादरियों के हैं, जो स्नेह भाव से होली की महत्ता को प्रदर्शित करते हैं। समाधि के महंत मंगलनाथ औघड़वीर बताते हैं कि सिद्ध बाबा से जुड़ी आस्था, श्रद्धा और भक्ति ग्रामीणों को फहीमपुर खुर्द लाती है। यह भारत की विविध संस्कृति का अनूठा स्वरूप है। बुजुर्ग सरपंच वन गोसाई बताते हैं कि दुल्हेंडी पर सिद्धबाबा का दूधिया प्रसाद ग्रहण करने से किसानों और पशुपालकों के यहां कभी दूध की कमी नहीं रहती, ऐसी मान्यता है। मौचड़ी के पूर्व प्रधान चंद्रपाल सिंह, हेमसिंह चौहान के अनुसार समाधि पर भोग प्रसाद लेने के बाद ही ग्रामीण अपने गांव लौट कर दुल्हेंडी पर्व मनाते हैं। ठा वीरेंद्र सिंह, सुनील पंडित पिपलहेड़ा का भी कहना है कि कब से बाबा की समाधि पर दुल्हेंडी पर दूध चढ़ाने की परंपरा है, उनके बुजुर्ग भी नहीं बता पाते थे।
शत्रुघ्न सिंह ने कराया मंदिर का जीर्णोद्धार
मुजफ्फरनगर। वर्ष 1993 में जिले के डीएम रहे शत्रुघ्न सिंह ने फहीमपुर खुर्द में सिद्धबाबा की समाधि मंदिर तक पक्की सड़क का निर्माण कराया था। उत्तराखंड में मुख्य सूचना आयुक्त सिंह कई बार समाधि पर आकर पूजा-अर्चना कर चुके हैं। वर्ष 2008 में उन्होंने समाधि स्थल का जीर्णोद्धार करा कर माता के मंदिर का निर्माण कराया था।