पिता की डायरी के पन्नों से मिला जीवन दर्शन
मुजफ्फरनगर। परवरिश से लेकर जिंदगी के हर मुकाम तक पिता की प्रेरणा नई राह दिखाती है। उनकी प्रेरक बातें हमेशा याद रहती है। अपने पिता की लिखी डायरियों में से जीवन दर्शन से जुड़ी बातों को एक बेटे ने फादर्स डे पर किताब के रूप में प्रस्तुत कर उन्हें नमन किया है। आत्मलोकन के उस पार पुस्तक पर्यावरणविद् सुरेश कुमार अहलूवालिया की आध्यात्मिक और दार्शनिक वैचारिक समृद्धि को समर्पित की गई है।
फादर्स डे पर पिता के व्यक्तित्व की महिमा को भोपा के डॉ ध्रुवपाल सिंह ने एक पुस्तक के माध्यम से दर्शाया है। उनके पिता चौधरी सुरेश कुमार अहलूवालिया ने सदैव सर्वधर्म संभाव, कर्तव्य परायणता और देश प्रेम जीवन का मूल्य माना। पांच साल पहले 29 मार्च 2013 को वे प्रभु चरणों में विलीन हो गए। भोपा के जनता इंटर कॉलेज से 12 वीं की परीक्षा में यूपी की मैरिट में स्थान हासिल किया था। विद्या विशारद की डिग्री की बाद वह निर्धन रोगियों को नि:शुल्क परामर्श और दवाईयां वितरित करते थे। समाजसेवा से उन्हें सुख की अनुभूति होती थी। डायरी लिखना उनकी दिनचर्या थी। मृत्यु से पूर्व तक अहलूवालिया ने करीब दो सौ डायरी लिखी। लखनऊ सचिवालय में राजस्व विभाग के उप सचिव डॉ ध्रुवपाल सिंह ने अपने पिता की जिंदगी के पन्नों को पढ़ा और लिपिबद्ध करने का निर्णय लिया। फादर्स डे पर पिता के विशिष्ट स्वरूप को उन्होंने पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया। पहली प्रति मां प्रेमलता को भेंट की। भोपा में यह परिवार खेती किसानी से भी जुड़ा है। डॉ धुव्रपाल सिंह कहते हैं कि जीवन में पिता भगवान तुल्य है। उन्हें मार्गदर्शन से राह मिली। वे रामायण के प्रसंगों को जीवन से जोड़ कर सुनाते थे। उनकी डायरियों के अवलोकन के बाद उनके आध्यात्मिक और दार्शनिक बोध को सब तक पहुंचाने का प्रयास किया है, ताकि समाज को प्रेरणा मिले।
पर्यावरण संरक्षण को समर्पित रहा जीवन
मुजफ्फरनगर। भोपा क्षेत्र में पर्यावरण के संरक्षण में चौधरी सुरेश कुमार अहलूवालिया का अहम योगदान रहा है। गंगा खादर और शुक्रताल क्षेत्र में फलदार वृक्षों के रोपण को बढ़ावा दिया। पेड़ काटने को वे हत्या जैसा जुर्म मानते थे। उनके घर में एक नीम का पेड़ मकान निर्माण में आडे़ आया, तो उन्होंने लिंटर के मध्य पेड़ को सुरक्षित रखा। रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के जीवन से प्रभावित रहे।