कोई घर से सीढ़ी उठा लाया तो कोई चारपाई
मुजफ्फरनगर। पुरी-हरिद्वार कलिंग उत्कल एक्सप्रेस हादसे के बाद बचाव कार्य के लिए प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय होने में एक घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया था। ऐसे में यात्रियों को बचाने में जिस जज्बे और एकजुटता से खतौली के बाशिंदों ने फर्ज अदा किया, वह काबिले तारीफ है। कोई सीढ़ी उठा लाया तो किसी ने बोगियों पर चढ़कर मुसाफिरों को निकाला। चारपाई की बुनाई करने वाले ने घायलों को संभालने के लिए 40 चारपाई स्ट्रेचर बना ली।
खतौली में टूटी पटरी से उतरी उत्कल एक्सप्रेस की बोगियों को 100 की स्पीड से ज्यादा गति से हवा में उछली थी। धमाके की आवाज और धूल का गुबार, यह मंजर जिसने भी देखा, उसका दिल दहल गया। चीख पुकार मची थी, बचाव कार्य को रेलवे और प्रशासन की मशीनरी दूर तक नहीं थी। ऐसे में आसपास के नागरिकों ने मोर्चा संभाला। जज्बे और जोश के साथ लहूलुहान बोगियों में चढ़कर यात्रियों को बाहर निकाला। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चों को सीढ़ियां लगाकर पलटे कोच से निकालते गए। सरकारी अमले को पहुंचने में एक घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया था। फरिश्ता बने लोग सब कुछ भूलकर बोगियों में फंसी जिंदगियों को बचाने में जुटे रहे। दिल्ली-मेरठ-टपरी ट्रैक पर रेल संचालन बहाल होने के बाद अमर उजाला ने हादसे की मुश्किलों में सहारा बने नागरिकों से बातचीत की। रेलवे ट्रैक के करीब सईदुर्रहमान लोहे की चारपाई की बुनाई करता है। चीख पुकार मची तो उसने अपने भाइयों रहीसुद्दीन और नाजिम को बुला लिया। दुकान की 40 से ज्यादा चारपाई बचाव कार्य में लगा दी। कराहते, तड़पते रेल यात्रियों के लिए चारपाइयां स्ट्रेचर बन गईं। उन्हीं के जरिये घायलों को एंबुलेंस तक लाया गया। मनोज बालियान के घर में भवन निर्माण का मैटेरियल रखा था। सीढ़ियां, लकड़ी की चाली बचाव में काम आई। जो बोगी पलट गई थी, उसके दरवाजे आकाश की तरफ थे। मनोज बताते हैं कि सीढ़ियां लगा कर यात्रियों को बारी-बारी से निकाला गया। उस वक्त हरीश अपनी दुकान पर बैठा था। एक बोगी उसकी दुकान के आगे तक आ गई, मगर उसने साहस नहीं खोया और साथियों के साथ मिलकर सहमे यात्रियों को संभाला। शुगर मिलकर्मी पंकज, नई बस्ती के आमिर पठान बदहवास महिलाओं और बच्चों को डिब्बों में घुसकर बाहर लाए। कोच में उखड़ी सीटों के बीच कई यात्री बुरी तरह फंसे थे। हाथ, पैर और चेहरे लहूलुहान थे। विशाल सैनी बताते हैं कि एक बोगी दूसरी बोगी पर चढ़ गई थी। वहां से यात्रियों को निकालने में मोटी रस्सियों का सहारा लिया गया। डर से कांपते मुसाफिरों को हौसले से संभालना पड़ा। राजीव अहलावत के मकान के सामने बोगी थी, उन्होंने घायलों को निकलवाया। उनके सामान की हिफाजत कर घर में रखा, जिसे बाद में जीआरपी के हवाले किया गया। नई बस्ती के नौशाद कहते हैं घायलों के बहते खून को रोकने के लिए लोगों ने चादरें जुटाई, जिन्हें फाड़कर जख्मों पर बांधा गया। अचानक हुए हादसे की किसी को कल्पना नहीं थी।