सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरकत में आया स्वास्थ्य विभाग शासनादेश का इंतजार कर रहा है। पैथालॉजिस्टों ने अपने नाम से लाइसेंस लेकर अनेक सेंटर चला रखे हैं। जिनके माध्यम से क्षेत्रीय चिकित्सकों से संपर्क कर ब्लड एकत्र किया जाता है। इसकी एक निर्धारित लैब पर जांच कर रोगियों को रिपोर्ट दी जा रही है। यह रिपोर्ट पूर्ण रूप से मानकों पर है या नहीं? इसकी सत्यता पर संदेह है।
जिलेभर में स्वास्थ्य विभाग से पैथालॉजी लैब के लिए करीब 15 लाइसेंस जारी किए गए हैं। मगर, लैबों की गणना की गई तो यह सैकड़ा पार कर गई है। इनमें सबसे बड़ी मुसीबत यह आई है कि एक पैथालॉजिस्ट ने अपने नाम से लाइसेंस ले रखा है, लेकिन ब्लड कलेक्शन के लिए दस से अधिक सेंटर चला रखे हैं। यहां ट्रेड-अनट्रेंड युवाओं, लैब टेक्नीशियनों के माध्यम से रोगियों का ब्लड एकत्र कराया जाता है। जिसकी जांच के लिए 12 से 24 घंटे मांगे जा रहे है। यह जांच किस लैब में होती है? इसकी जानकारी विभाग को नहीं है। जबकि रिपोर्ट पर लैब की मुहर और नाम दर्शाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने जांच रिपोर्ट पर पैथालॉजिस्ट के हस्ताक्षर को जायज ठहराया है, जबकि लैब टेक्नीशियन या अन्य के हस्ताक्षर मान्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद विभागीय अधिकारियों ने जांच-पड़ताल की तो चौंकाने वाली स्थिति सामने आई है। विभागीय अफसरों का कहना है कि कार्रवाई फर्जी लैबों पर की जा सकती है। लेकिन, एक पैथालॉजिस्ट कितने सेंटर चला सकता है। इसकी कोई गाइड लाइन शासन से नहीं है। ऐसे में कार्रवाई मुश्किल हो गई है। फिलहाल इस बारे में शासन को लिखा गया है। वहां से कोई शासनादेश आने पर कार्रवाई संभव होगी।
एसीएमओ प्रवीण चोपड़ा ने बताया कि लैबों पर पैथालॉजिस्ट की जांच होगी। एक पैथालॉजिस्ट के कितने सेंटर चल रहे हैं? इसकी भी कुंडली खंगाली जा रही है। अधोमानक सेंटर मिलने और फर्जी लैबों पर शिकंजा कसा जाएगा। इसके लिए अधिकारियों की टीम बनाई गई है।