देवबंद (सहारनपुर)। फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना मुफ्ती अरशद फारुकी का कहना है कि रोजे की हालत में किसी की जान बचाने को खून दिया जा सकता है, लेकिन चिकित्सक की सलाह पर खून देने के लिए रोजा तोड़ने की जरूरत नहीं है।
देहरादून निवासी मो. आरिफ खान ने पिछले वर्ष रोजा कजा कर अजय नामक युवक को ए-पॉजिटिव ब्लड देकर उसकी जान बचाई थी। दरअसल अजय के शरीर में पांच हजार प्लेटलेट्स थी और जान बचाने के लिए ए-पॉजिटिव खून की आवश्यकता थी, लेकिन इस ग्रुप का डोनर नहीं मिल रहा था। आरिफ खान को इसका पता लगा तो वह चिकित्सक के पास गया और खून देने को कहा। साथ ही बताया कि वह रोजे से है। जिस पर चिकित्सक ने उसे रोजा तोड़ने की सलाह दी। चिकित्सक की सलाह पर आरिफ ने अजय को खून देकर उसकी जान बचाई। रोजा कजा कर आरिफ द्वारा अजय की जान बचाने की खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो आरिफ की जमकर प्रशंसा होने लगी, इसके साथ ही लोगों ने मुफ्तियों से इस मसले के बारे में भी पूछा। इस मुद्दे पर फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना मुफ्ती अरशद फारुकी का कहना है कि किसी को खून देने के लिए रोजा तोड़ने की जरूरत नहीं है। उसको तोड़े बिना भी खून दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि रोजा उसी सूरत में कजा किया जा सकता है या तो अपनी जान जाने का अंदेशा हो या फिर रोजा कजा करने वाला उस एक रोजे के बदले दो माह के रोजे रखने की हिम्मत रखता हो।