भाव और आत्मा से जुड़ा था गणतंत्र
मुजफ्फरनगर। शुक्रवार को 69वां गणतंत्र दिवस मनाया जाएगा। उत्साह और जोश के साथ युवा पीढ़ी दिवस को मनाने के लिए तैयार हैं, लेकिन बुद्धिजीवी इसे महज औपचारिकता मानते हैं। पूर्व के गणतंत्र के चश्मदीद बुजुर्ग साफ कहते हैं कि पहले गणतंत्र, स्वतंत्रता दिवस से लोगों का भाव और आत्मा जुड़ी थी। बिन कहे ही इस तारीख (दिन) को गांव-गांव और गली-गली जयकारे गूंजने के साथ चौराहों पर भीड़ जुटती है। अब ऐसा माहौल नजर तो आता है, मगर भावात्मक उत्साह नहीं दिखता है।
डीएवी कॉलेज के पूर्व समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ कलम सिंह कहते हैं कि उनके जीवन में पहला गणतंत्र 1953 में रहा है। गणतंत्र दिवस की तैयारियों को लेकर गांव-गांव में नेता, पार्टी जुटती थीं। मातृभूमि के लिए उत्साह तो रहता ही था, साथ ही लोग भावनात्मक और आत्मीयता से जुड़े थे। प्रभातफेरियां निकालने के साथ गांवों में चौपाल होती थी, जिन पर उच्च नेता जनता के बीच बैठकर देश, उसकी समस्याएं और बेहतर विकास का खाका बनाते थे। अब ऐसा माहौल नहीं रहा है। आधुनिक हो रहे जीवन में कई चीजों का साथ छूट गया है।
डीएवी कॉलेज के पूर्व कला विभागाध्यक्ष डॉ महावीर सिंह सैनी ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस को लेकर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में उत्साह रहता था। कहीं कोई दिखावा नहीं था, स्कूलों के साथ गांव की गलियों में खूब प्रचार होता था। अपनी मातृभूमि के लिए हर व्यक्ति आत्मीयता से साथ रहता था। जोश और जुनून के साथ मीलों की दूरियां तय कर अपने स्कूल, कॉलेज पहुंचते थे। उस रोज किसान तक खेतों में काम न करके अपने बलिदानियों को नमन करते थे। अब वह दौर नहीं रहा है। युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति और संस्कारों से दूर हो रही है, जिसके चलते गणतंत्र, स्वतंत्रता आदि दिवसों पर औपचारिकता निभाई जाती हैं।
वयोवृद्ध शहरकाजी जहीर आलम कहते हैं कि पहले गणतंत्र दिवस को लेकर सभी मजहब के लोग एकसाथ मुहिम का हिस्सा बनते थे। 26 जनवरी से एक सप्ताह पहले से ही स्कूल, मदरसों में भी अपने मुल्क की तरक्की के साथ आपसी सौहार्द, भाईचारे को लेकर दुआएं होती थीं। इस दिन को सबसे बेहतर माना जाता था। आज के दौर में राजनीति और नेताओं ने अपने फायदे के लिए बना लिया है। वह कहते हैं कि बच्चों को अन्य चीजें स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं, लेकिन गणतंत्र, स्वतंत्रता के साथ बलिदानियों के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी जाती है।
पूर्व विधायक महावीर आजाद कहते हैं कि उन्होंने पहला गणतंत्र तो नहीं देखा है, लेकिन उस दौर को सुना जरूर है। बात चालीस के दशक की है। कारोबारी, व्यापारी, किसानों के साथ आम लोग भी इस दिन अपने कामकाज को रोक देते थे। एक मंच पर एकत्र होकर अपनी मातृभूमि को श्रद्धापूर्वक नमन करने के साथ जोश और उत्साह से जश्न मनाया जाता है। पार्टियों के नेता भी जनता के बीच पहुंचकर भारतीय संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा देते थे। छोटे-छोटे बच्चों को आजादी के बारे में बताकर उनके भीतर देशभक्ति का जज्बा पैदा किया जाता था। अब भीड़ एकत्र होती है, मगर पलभर के बाद सबकुछ भूल जाते हैं। पहले ऐसा नहीं था। कुछ छूट जाए तो उसका मलाल होता था।