श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र वहलना में मंगल प्रवचन में आचार्य ज्ञान सागर महाराज ने कहा कि आत्मशुद्धि के लिए इच्छाओं को रोकना तप है। शरीर को प्रमादी नहीं बनने देने के लिए बहिरंग तप किए जाते हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि मानसिक इच्छाएं सांसारिक बाहरी पदार्थों में चक्कर लगाया करती हैं। शरीर के सुख साधनों में केंद्रित रहती है। मन की वृत्ति आत्म मुख करने के लिए अंतरंग तपों का विधान किया है। तप आत्मशुद्धि के लिए अमोघ साधन है। सूर्य निकलने के बाद जो तपन होती है, उससे फल सब्जी में मिठास आता है। जो फल सूर्य की किरणों से तपकर नहीं बनता वह फल स्वादिष्ट नहीं हो पाता है। सोने से तपकर ही आभूषण बनता है। तप एक रसायन हो जो आत्मशुद्धि में सहायक होता है। किसान अपने को तपाता है, पसीना बहाता है तब उसके द्वारा उपजाया अनाज हमें प्राप्त होता है। तप के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता।