तीर्थनगरी शुक्रताल शनिधाम में आयोजित साप्ताहिक रामायण कथा में दशनाम सन्यास आश्रम लक्ष्मी नारायण मंदिर गीता कालोनी दिल्ली की अधिष्टता महामंडलेश्वर विद्यया गिरी साध्वी ने कहा कि जो धारणा है, वही धर्म है, वही संकल्प है। धर्म, जातपात में नहीं बनता है। हमारे सनातन धर्म संस्कृति परंपरा धर्म की मर्यादा है। आधारभूत मान्यताओं को पालन करना वही धर्म है।
श्री नवग्रह पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के तत्वाधान में शुक्रताल शनिधाम में मुख्य अतिथि के रुप में पधारी साध्वी विद्यया गिरी ने कहा कि हमारी जीवन शैली है, ना कि धर्म। एक परिवार के लोगों का अलग-अलग धर्म है। पिता, पुत्र, पत्नी, माता आदि का आचरण व्यवहार को धर्म की संज्ञा दी जाती है, जबकि वह आचरण है। जैसे पिता का अपना धर्म संतान का पालन पोषण करना, पुत्र का धर्म है पिता की सेवा करना। अगर यह विपरीत दिखता तो उसे अधर्म कहते हैं। मर्यादाओं का पालन पोषण, बड़ों के सामने झुकना धर्म है। बड़ों को झुकाना अधर्म है। इस मौके पर महंत बंशीपुरा महाराज, स्वामी गंगा पुरी महाराज, स्वामी उत्तमगिरी महाराज, स्वामी पुरुषोत्तम महाराज, स्वामी महेशपुरी महाराज, राधे, रमेश पंडित, पंडित देवराज आदि साधु संत मौजूद रहे। वहीं गुड़ीना कलां पंजाब, गीता कालोनी दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड सेे श्रद्धालु कथा सुनने के लिए पधारे हुए हैं। भंडारे का भी आयोजन किया गया।