हादसा नहीं इसे बेगुनाहों की हत्या कहिए...
मुजफ्फरनगर। रेलवे के सुरक्षित सफर के दावे की खतौली उत्कल हादसे ने हवा निकाल दी है। अभी तक की जांच में हर पहलू को खंगालने के बाद यह दुर्घटना नहीं, रेल यात्रियों की हत्या करने जैसा अपराध है। रेलवे ट्रैक के रखरखाव की जिम्मेदारी निभा रहे अफसरों और इंजीनियरों ने आंखें मूंद ली थी। ट्रैक से गुजरने वाले हजारों ट्रेन यात्रियों की जान गैंगमैन और संविदा कर्मियों के हवाले कर दी गई थी। रविवार को दिनभर डब्बों को क्रेनों से खींचने और ट्रैक को सही करने का काम चलता रहा। पलटी बोगियों में कोई शव नहीं मिलने से राहत महसूस की गई।
हादसे का सच क्या है, यह रेलवे अफसर बेहतर जानते हैं। डीआरएम और जीएम के निरीक्षण के बाद कोई ब्रीफिंग नहीं करना रेलवे को कटघरे में खड़ा करता है। मोदी सरकार में केंद्रीय रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने यात्रियों से सुरक्षित सफर जो वादा किया था, वो तमाम दावों को झुठलाता दिख रहा है। उत्कल एक्सप्रेस की दुर्घटना में 22 बेगुनाहों को जान से हाथ धोना पड़ा। आखिर कब तक रेल यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़ होता रहेगा। शनिवार को खतौली में सहारनपुर-दिल्ली रेल लाइन को दुरुस्त करने का पूरा काम नियमों को ताक पर रखकर किया गया, उससे लगता है कि रेलवे के अफसर और अभियंता आंख मूंदे हैं। पटरी को काटने के बाद बिना वेल्डिंग कराए कैसे जेई मौके से गायब हो गया। स्टेशन अधीक्षक तक को नहीं मालूम था कि स्टेशन से 700 मीटर आगे पटरी खुली पड़ी है। प्लेटफार्म पर हरी झंडी लिए रेल कर्मचारी खड़ा रहा और उत्कल दौड़ते हुए निकल गई। पंजाब, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे राज्यों से जुड़े रेलवे ट्रैक पर व्यवस्था की यह बदहाली सवाल खड़े करती है। हर दिन इस ट्रैक से हजारों रेल यात्री पूरे देश के लिए सफर करते हैं। रविवार को बचाव कार्यों में रेलवे कर्मचारी जूझते रहे। ट्रैक से उतरे डब्बों को सीधा करने और ट्रैक खाली करने में रेलवे की टीम जुटी रही। बचाव कार्य के दौरान एक कर्मचारी सिर में चोट लगने से घायल हो गया। क्रेन से बोगियों को बमुश्किल एक-दूसरे के ऊपर से उतारा गया। एक तरफ रेल के डिब्बों को व्यवस्थित किया गया तो दूसरी ओर दुर्घटना के बाद उखड़ गए ट्रैक के स्लीपरों को लगाया गया। सीमेंट से बने स्लीपर लगाकर पत्थर की गिट्टियां बिछाई गईं। रेलवे लाइन के दोनों ओर शनिवार की दुर्घटना का मंजर खौफनाक हादसे की तस्वीर दिखा रहा था। इधर-उधर खाली बैग, अटैची, जूते-चप्पल और कपड़े बिखरे पड़े थे। सफर के दौरान ली गई यात्रियों की खाद्य सामग्री भी डिब्बों में फैली हुई थी। बोगियों से निकले पहिये और गैस कटर से काटे गए डिब्बों का लोहा बिखरा हुआ है। कई बोगियों पर अभी भी मांस के लोथड़े लटके हुए हैं।
बोगियों की सीटों पर फैला खून सूख चुका है। बुरी तरह क्षतिग्रस्त पेंट्री कार में शवों के होने का अंदेशा था। घटनास्थल पर आज भी हजारों की भीड़ जमा थी, जब पेंट्री कार को उठाया गया तो गनीमत रही कि तलाशी के बाद पूरी बोगी में कोई हताहत नहीं मिला। आरपीएफ, जीआरपी और पीएसी के हवाले पूरी व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी थी। मेरठ, गाजियाबाद और मुजफ्फरनगर से भेजे गए फोर्स ने भीड़ को जैसे-तैसे संभाला। खतौली के कई मोहल्लों की गलियां रेलवे ट्रैक के दोनों ओर खुलती हैं। महिलाएं और बच्चे दूर से रेलवे का बचाव कार्य देखते रहे। बस्तियों की छतों पर भी महिलाएं और बच्चे हादसे के बाद बचाव कार्य को देखने के लिए उत्सुक थे। दुर्घटना की सूचना पर मध्यप्रदेश के ग्वालियर, मुरैना और राजस्थान के शहरों से भी परिजन घटनास्थल पर सामान तलाशते दिखे। खतौली के मंदिरों और धर्मशालाओं में भी सकुशल बचे यात्रियों का डेरा था।
ट्रैक को सुचारु करना प्राथमिकता: आईजी
खतौली। हादसे के बाद रेलवे के जो अधिकारी पहुंचे, उनमें जीएम आरके कुलश्रेष्ठ, आईजी नॉर्दन रेलवे संजय किशोर, सीनियर डिविजनल सिक्योरिटी कमिश्नर शशि कुमार शामिल रहे। उन्हीं के सामने ट्रैक की मरम्मत शुरू हुई। आईजी संजय किशोर ने बताया कि ट्रैक को जल्द से जल्द ठीक करना प्राथमिकता है, ताकि रेलों का आवागन सुचारु किया जा सके।