शुकदेव आश्रम में बनवाया था मां शाकंभरी का मंदिर
मोरना। शुकतीर्थ में संयम सप्ताह कर महान आध्यात्मिक विभूति मां आनंदमयी ने भक्तों को धन्य किया था। हरि बाबा और स्वामी अखंडानंद सरस्वती के सानिध्य में वह दो बार धार्मिक नगरी में आई। वीतराग स्वामी कल्याण देव के आग्रह पर शुकदेव आश्रम में स्थित शाकंभरी देवी मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा मां आनंदमयी ने की थी। उनके स्मृति दिवस पर आचार्यों, पुरोहितों और ब्रह्मचारियों ने ध्यान और ईश्वर उपासना की।
प्रसिद्ध संत मां आनंदमयी की पुण्यतिथि पर शुकदेव आश्रम में उनकी स्मृतियों को नमन किया गया। सनातन धर्म, संकीर्तन और सदाचार का संदेश देने वाली विभूति ने दो बार शुकदेव आश्रम में संयम सप्ताह के दौरान भक्तों को दिव्य ध्यान, संयम और ईश्वर उपासना की दीक्षा दी। वीतराग स्वामी कल्याण देव से आत्मीय स्नेह रहा। मां आनंदमयी के सत्संग में पधारी दयावती मोदी ने उनके आग्रह पर भागवत पीठ में मां शाकुंभरी देवी मंदिर का निर्माण कराया था, जिसकी प्राण प्रतिष्ठा खुद उन्होंने की। पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद सरस्वती बताते हैं कि उन्हें संतों से बड़ा स्नेह था। 70 के दशक में इलाहाबाद कुंभ में उनका संयम सप्ताह शिविर लगा, जिसमें गुरुदेव कल्याण देव महाराज के पधारने पर मां आनंदमयी ने उनका हाथ अपने सिर पर रख लिया। संतों को वे पिताश्री कह कर आदर देती थीं। गरीबों को शिक्षा, चिकित्सा और सेवा कार्यों में उनका जीवन समर्पित रहा। शुकतीर्थ में एकांत साधना को आती थी और श्रद्धालुओं को भगवत स्मरण के लिए प्रतिदिन 15 मिनट देने की शिक्षा देती थी। शुकदेव संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य ज्ञान प्रसाद और आचार्य गिरीशचंद उप्रेति के निर्देशन में ब्रहमचारियों ने मां आनंदमयी की स्मृति में ध्यान, ईश्वर उपासना की। श्याम आचार्य, कथा व्यास आशीष माधव शास्त्री ने विचार रखे।
कनखल आश्रम में बनी समाधि
शुक्रताल। वैदिक धर्म, हिंदू दर्शन और भारतीय संस्कृति की प्रति मूर्ति मां आनंदमयी वर्ष 1922 में गृहस्थ जीवन का त्याग कर सन्यास आश्रम में आई थी। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरु उनके दर्शन को हरिद्वार आए थे। उन्होंने देश के कई तीर्थो में अपने संयम ध्यान केंद्र स्थापित किए। हरिद्वार के कनखल आश्रम में 27 अगस्त 1982 को वह ब्रहमलीन हो गई। वहीं उनकी समाधि बनी है।