प्रशासन की तैयारी पर उठे सवाल
मुजफ्फरनगर।
जिले में पुलिस और प्रशासन का सूचना तंत्र कितना पंगु हो चुका है, दस अप्रैल को शहर में बिना बात के दहशत का माहौल बनाए रखना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दलित संगठनों ने दो अप्रैल के बंद से पहले सैकड़ों स्थानों पर मीटिंग की थी। दस दिन तक उनकी तैयारी चली। पांच दलित संगठन जनता से संपर्क कर जिला मुख्यालय पर एकत्र होने की अपील करते रहे। हमारी पुलिस और प्रशासन का सूचना तंत्र है कि वह सोया रहा। जब शहर में हजारों की भीड़ एकत्र हो गई तो कहने लगे उम्मीद नहीं थी। समझ नहीं आता कि यह सूचना तंत्र सूचना कहां से एकत्र कर रहा है। प्रशासन के पास गांव के लेखपाल से लेकर चौकीदार तक है। पुलिस के बाद गांव-गांव फैला पुलिस का जाल और एलआईयू और कई खुफिया एजेंसी है। इन सबकी कार्यशैली पर ही सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। दस अप्रैल को डीएम राजीव शर्मा और एसएसपी अनंतदेव तिवारी ने बिना किसी संगठन और किसी व्यक्ति का नाम सामने आए ही बंद को लेकर आशंका व्यक्त कर डाली। यही नहीं शिक्षण संस्थाएं एक दिन के लिए बंद कर दी। सोशल मीडिया पर 16 घंटे का प्रतिबंध लगा दिया। शहर में चारो तरफ ऐसी तैयारी कि न जाने कौन सा बड़ा संगठन जबरन बाजार बंद कराने आ रहा था। दो अप्रैल को कोई तैयारी नहीं, दस अप्रैल को बिना बात के तैयारी, प्रशासन की कार्य प्रणाली समझ से परे है।
अजीब सा सन्नाटा क्यों है भाई
मुजफ्फरनगर। शहर की सड़कों पर मंगलवार को अजीब सा सन्नाटा दिखाई दिया। मंगलवार होने के कारण बाजार तो बंद ही रहते है, लेकिन जो दुकान खुली उनमें ग्राहक नजर नहीं आया। शहर में भय और दहशत का ऐसा माहौल बना दिया गया कि हर कोई सहमा और डरा सा दिखाई दिया। जो लोग दस अप्रैल की अफवाह से अनजान थे वह एक दूसरे से यही पूछ रहे थे कि शहर में अजीब सा सन्नाटा क्यों है भाई।