पुण्य कर्म में जीवन की सार्थकता : ओमानंद
मोरना (मुजफ्फरनगर)। भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद सरस्वती ने कहा कि पापकर्म से जीवन की शांति, समृद्धि और आत्मिक बल नष्ट होता हैं। मन, वचन और कर्म में पुण्य भाव जगाए, तभी प्रभु प्राप्ति होगी।
श्री शुकदेव आश्रम स्थित डोंगरे भागवत भवन में हरिद्वार से आई महा मंडलेश्वर साध्वी करुणा गिरि की कथा का शुभारंभ स्वामी ओमानंद ने किया। संतश्री ने कहा कि भागवत ज्ञान का सरोवर हैं, वेदों और उपनिषद का सार हैं। ईश्वर प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। पापकर्म से अमूल्य जीवन निरर्थक होता हैं। सुख, समृद्धि और आत्मिक ऊर्जा नष्ट होती हैं। सच्चे मन से पुण्य कर्म करे, तभी भगवान की कृपा मिलेगी। भागवत मन के विकारों को दूर करती है। आत्मा की पवित्रता के लिए ईर्ष्या, बैर भाव का त्याग करें। अज्ञानता मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु हैं। अचेतन में फंसे प्राणियों को चेतन की पहचान भागवत करती है। जीवन कैसे जीये, ईश्वर से कैसे आत्मा जुड़े आदि जीवन कल्याण की राह कथा श्रवण से मिलती है। परोपकार और सेवा भाव करने से मनुष्य सत्कर्मों पर अग्रसर होता है।
गुरुदेव स्वामी कल्याण देव ने सेवा को प्रभु भक्ति मानकर मानवमात्र के उत्थान को जीवन समर्पित किया था। महा मंडलेश्वर साध्वी करुणा गिरि ने कहा कि भागवत श्रीकृष्ण का ही रूप है। सत्य ज्ञान से ही जीवन की बुराइयां समाप्त होती है। यज्ञमान राजू रहे। हरीश सेठी ने पूजन किया। मौके पर अचल शास्त्री, सुमन शास्त्री, आचार्य श्याम आदि मौजूद रहे।