बारूदी गोले क्यों भर गए नेताओं के बोलो में...
मुजफ्फरनगर। हिंदी उर्दू साहित्यिक संस्था समर्पण की काव्य गोष्ठी में कवियों ने अपनी रचनाओं से सामाजिक विकृतियों पर प्रहार किया। जनकपुरी के एसएसपीएम स्कूल में गोष्ठी की अध्यक्षता ईश्वर दयाल गुप्ता एवं संचालन अब्दुल हक सहर ने किया।
प्रीतम सिंह प्रीतम ने पढ़ा- देखो झुलस न जाए देश धर्म- मजहब के शोलों में, बारूदी गोले क्यों भर गए नेताओं के बोलों में। अब्दुल हक सहर ने हादसों पर कहा- हर कदम पर नया इक हादसा होता है यहां, घर से निकलों तो दुआओं का सहारा लेकर। काविश समर ने राष्ट्र प्रेम को समर्पित काव्य पाठ किया। उन्होंने कहा- ये दो चीज जमाने में मुझे महबूब दिल से हैं, वो परचम हिंद का हो या मेरी अम्मी का आंचल हो। अनिल धीमान पोपट ने पढ़ा- दूर से ही देखकर कहने लगी थी वो, अब लौटकर फिर मेरा बीमार आ गया। मास्टर शौकत फहमी ने पढ़ा- यही रह जाएगा सब कुछ, किसी का कुछ धरा है क्या। शहादत पाई हो जिसने, वो मर कर भी मरा है क्या। रामशरण प्रजापति, नाहिद समर, सुशीला शर्मा, प्रतिभा त्रिपाठी, मुस्तफा कमाल, राकेश कुमार, सुमन सिंह पाषाण, जेपी सविता, रियाज अहमद, शशि सक्सेना, इमरान फारूकी, अंकुर सक्सेना, पवन कुमार, ब्रजराज स्वरूप, शाहिद, ब्रज बिहारी धुरयिा ने विचार रखे।