मुजफ्फरनगर। पश्चिम उत्तर प्रदेश के 14 जिलों के किसानों को नई तकनीक, गन्ना बीजों और आधुनिक खेती के तौर तरीकों से रूबरू कराने वाला गन्ना शोध संस्थान संकट में है। तीस लाख से अधिक किसानों का जिम्मा सिर्फ 11 कर्मचारियों पर है। स्थापना के 93वें साल में ही अनुसंधान प्रभावित होने से सिर्फ किसानों पर नहीं, बल्कि गन्ने के भविष्य पर भी खतरा है। वरिष्ठ और सहायक वैज्ञानिकों की संख्या सिर्फ छह है। प्रजनन समेत कई विभाग खाली है।
गन्ने की खेती के दम पर मुजफ्फरनगर का नाम चीनी का कटोरा पड़ा। शाहजहांपुर के बाद अंग्रेजी शासनकाल में पश्चिम उत्तर प्रदेश के लिए 1934 में शोध संस्थान खोला था। एक या दो नहीं, गन्ने की 50 से अधिक प्रजातियां खेतों तक पहुंचाने में संस्थान का अहम योगदान रहा। रसगुल्ला के नाम से मशहूर हुई सीओ 88230 भी केंद्र पर हुए अनुसंधान से निकली। इसके अलावा दो साल पहले सामान्य गन्ने की प्रजाति 15235 भी यहीं से निकली।
किसानों के जीवन में खुशहाली लाने वाले संस्थान की स्थापना के 93वें साल में सबसे बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। चार साल पहले संयुक्त निदेशक पद खाली हुआ तो अब तक नई नियुक्ति नहीं हुई। डॉ. जेपी सिंह को प्रभारी बनाया गया, अब वही काम देख रहे हैं। वैज्ञानिकों की कमी से अनुसंधान का काम प्रभावित हो रहा है। एक दौर में यहां सौ कर्मचारी थे लेकिन वर्तमान में संख्या सिर्फ 11 है।
इस तरह हुई यूपी के प्रमुख गन्ना केंद्रों की स्थापना
केंद्र स्थापना क्षेत्रफल/हेक्टेयर
गन्ना शोध संस्थान, शाहजहांपुर 1912 101.54
गन्ना शोध संस्थान, मुजफ्फरनगर 1934 40.20
गन्ना शोध केंद्र गोला, खीरी 1961 77.34
गन्ना प्रजनन एवं शोध संस्थान कुशीनगर 1975 114.58
गन्ना शोध संस्थान में यह होते हैं प्रमुख पद
संयुक्त निदेशक, मुख्य सांख्यिकी अधिकारी, प्रक्षेत्र प्रबंध अधिकारी, लेखाधिकारी, वरिष्ठ प्रसार सहायक, एग्रीक्लचर सुपरवाइजर, जीप/कार चालक, लिपिक वर्ग, वरिष्ठ और सहायक वैज्ञानिक समेत अन्य चतुर्थ श्रेणी के पदों का आवंटन होता है।
वर्जन
संस्थान के शस्य अनुभाग के प्रभारी डॉ. जेपी सिंह कहते हैं कि सबसे ज्यादा दिक्कत वैज्ञानिकों की कमी से होती है। अनुसंधान में नई नियुक्ति जरूर होनी चाहिए। बीज आवंटन का कार्य ही किसी तरह कराया जाता है। वैज्ञानिकों के पास सहायक तक नहीं है।
तीन मंडल, 14 जिलों का शोध संस्थान
सहारनपुर, मेरठ और मुरादाबाद मंडल के जिलों के किसानों को गन्ना शोध संस्थान से ही बीज का आवंटन होता है। गन्ने की नई प्रजातियों की जानकारी देने के लिए इन किसानों का प्रशिक्षण भी मुजफ्फरनगर में ही कराया जाता है।
संस्थान में तैनात है यह वरिष्ठ वैज्ञानिक
प्रभारी डॉ. जेपी सिंह के अलावा मृदा रसायन में डॉ. वेदप्रकाश, कीट प्रबंधन में डॉ. अजय कुमार, प्रजनन में डॉ. कृष्णपाल सिंह कार्य कर रहे हैं। केंद्र से डॉ. ओएस जोशिया, डॉ. एसपी सिंह, अवधेश कुमार सेवानिवृत्त हो गए।