हजार - पांच सौ के नोट बंद होने के बाद से ढलइए करेंसी एक्सचेंज व कैश निकासी को बैंक लाइन में खड़े हैं और हालत निर्यातकों की पतली हो रही है। दस्तकार, कारीगर (ढलइए) और कारखानेदार मुरादाबाद की एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के आधार हैं।
नोटबंदी के बाद से इन तीनों की ही हालत खस्ता है। ढलइयों ने काम बंद कर रखा है, जिसका सीधा असर एक्सपोर्टर्स पर पड़ रहा है। निर्यातकों पर वक्त से आर्डर पूरा करने का दबाव है। लेकिन ढलइयों की कामबंदी ने प्रोडक्शन को आधा कर दिया है और शिपमेंट लेट होने की स्थिति बन गई है।
ऐसा हुआ तो विदेशी बायर्स की नजरों में एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की साख पर बट्टा भी लग सकता है। मुरादाबाद के हैंडीक्राफ्ट की पहचान देश - दुनिया में है। हैंडीक्राफ्ट को बुलंदियों पर पहुंचाने में कारीगरों का अहम रोल है। लेकिन यही कारीगर (ढलइए) इस वक्त बैंकों की लाइनों में लगे हैं।
जिसकी वजह से इनके हाथों ने पीतल को तराशने का काम फिलहाल रोक दिया है। दरअसल ढलइए सीधे तौर पर तो निर्यातकों से नहीं जुड़े होते हैं, इनका वास्ता कारखानेदारों से होता है। लेकिन कारखानेदार भी निर्यातकों के ही आर्डर पर काम करते हैं लिहाजा ढलइयों की कामबंदी का असर सीधे - सीधे निर्यातकों पर पड़ रहा है।
दरअसल निर्यातक कारखानेदारों से हजार - पांच सौ के पुराने नोटों पर आर्डर पूरे करने का दबाव बना रहे हैं। कारखानेदार इन्हीं नोटों को कच्चे माल की खरीद और कारीगरों के मेहनताने में खपाना चाहते हैं। लेकिन कारीगरों ने हजार - पांच सौ के पुराने नोटों पर काम करने से साफ इंकार कर दिया है।
कारीगरों को मनाने को कारखानेदार हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कारीगर काम पर लौटने के बजाए हजार - पांच सौ के उन नोटों को एक्सचेंज करने के लिए बैंक की कतारों में लगे हैं जो नोटबंदी के बाद कारखानेदारों ने उन्हें बतौर पगार दिए थे।
कारीगरों के लाख इंकार करने के बावजूद कारखानेदारों ने उन्हें पगार में बड़े नोट दे दिए। इससे खफा कारीगरों ने काम से किनारा कर रखा है। ढलइयों की हठ ने निर्यातकों की बेचैनी बढ़ा दी है। निर्यातकों को शिपमेंट लेट होने से आर्डर कैंसिल होने का डर सताने लगा है। नोटबंदी के बाद उपजे हालात ने मुरादाबाद की एक्सपोर्ट इंडस्ट्री को संकट में ला दिया है।