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वीर नारियों का किया सम्मान संग विजय मशाल का बढ़ाया मान

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मंगलवार को मुरादाबाद पहुंची विजय मशाल को आईएफटीएम विश्वविद्यालय में स्वर्ण जयंती विजय दिवस पर श - फोटो : CITY
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मुरादाबाद। सन् 1971 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध की जीत का जश्न मनाने के लिए मंगलवार को स्वर्णिम विजय मशाल मुरादाबाद के आईएफटीएम विश्वविद्यालय पहुंची। यहां पर सेना ने वीर नारियों का सम्मान किया। अपने परिजनों की शहादत को याद करके वीर नारियों की आंखें छलक पड़ीं। वीर सैनिकों के जाने के बाद तमाम मुश्किलों का सामना करतीं महिलाओं को आज भी इस शहादत पर गर्व है। एनसीसी कैडेट्स ने विजय मशाल को सलामी दी। सेना के अधिकारियों ने युवाओं को सेना में भविष्य बनाने का आह्वान किया।
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एचक्यूयूबी एरिया और आर्टिलरी रेजीमेंट की ओर से मंगलवार सुबह नौ बजे बरेली से विजय मशाल मुरादाबाद पहुंची। सिविल लाइंस स्थित शहीद स्मारक में सेना के अधिकारियों ने वीर शहीदों को नमन किया और विजय मशाल की रीफिलिंग की। इसके बाद सेना का कारवां विजय मशाल के संग आईएफटीएम विश्वविद्यालय पहुंचा। नवीं बटालियन गर्ल्स एनसीसी और 24वीं बटालियन एनसीसी के कैडेट्स ने विजय मशाल को सलामी दी। इसके बाद अधिकारियों ने वीरों को याद कर पुष्प चक्र अर्पित किए। सेना के बैंड ने विजयी धुन बनाई। एनसीसी के कैडेट्स ने ‘हम सब भारतीय हैं गीत सुनाया।’ इसके अलावा देशभक्ति गीत की प्रस्तुति दी गई। 1971 के युद्ध में भारतीय विजय पर बनी एक लघु फिल्म भी दिखाई गई।
346 फील्ड रेजीमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल के शहनाज, तहसीन फातिमा, एनसीसी अधिकारी डॉ. राजकुमारी ने वीर नारियों का सम्मान किया। 346 फील्ड रेजीमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल के शहनाज ने बताया कि विजय मशाल बरेली में दस दिन से थी। सोमवार को मुरादाबाद और रामपुर आई है। यह 1971 के वीरों की शौर्य गाथा प्रदर्शित करती है। उन्होंने कहा कि हमारी सेना पहले भी मजबूत थी, आज भी मजबूत है और हमेशा मजबूत रहेगी। सेना से जुड़कर देशसेवा करने से बड़ा सौभाग्य कुछ नहीं होता है। एनसीसी कैडेट्स हमारे देश का भविष्य हैं। यही देश को आगे बढ़ाएंगे।
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यह रहे मौजूद
अपर जिलाधिकारी प्रशासन लक्ष्मी शंकर सिंह, कर्नल वीके सिंह, कर्नल श्यामलाल, कुलसचिव संजीव अग्रवाल, अपर नगर मजिस्ट्रेट मुरादाबाद प्रबुद्ध सिंह, सूबेदार मेजर प्रदीप कुमार जुयाल, सूबेदार संजीव कुमार, सीएचएम मुकेश कुमार, लेफ्टीनेंट कर्नल आर. श्रीगणेश, कैप्टन मुकेश दत्त, सूबेदार इकबाल सिंह, नगर मजिस्ट्रेट महेन्द्र पाल सिंह, विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रोफेसर राहुल कुमार मिश्रा, वित्त अधिकारी डॉ. कुशल पाल सिंह, प्रोफेसर इंतेजार मेंहदी, वैभव त्रिवेदी, प्रोफेसर नवनीत वर्मा, प्रोफेसर एसबी मिश्रा, प्रोफेसर बीके सिंह आदि मौजूद रहे।
नहीं हो सका बेटे को साइकिल दिलाने का वायदा
हरथला निवासी वीर नारी सुनीता देवी ने बताया कि उनके पति जयकुमार सिंह जाट रेजीमेंट में थे। पांच मार्च 2000 को कारगिल के युद्ध में शहीद हुए थे। उन्होंने कहा कि एक दिन पहले ही बड़े बेटे से फोन पर बात हुई थी और उन्होंने उसे साइकिल देने का वायदा किया था। एक सप्ताह बाद उन्हें अवकाश पर आना था, लेकिन दूसरे ही दिन शहादत की खबर मिली। आखिरी बार जब वह ड्यूटी से गए थे तो उन्होंने कहा था कि युद्ध में कोई शहीद हो जाए, इससे बड़ी गर्व की बात कुछ नहीं होती है और यह बात सच हो गई। भले ही इस घटना को 20 वर्ष का समय हो गया है, लेकिन आज भी उनके पत्रों को मैंने संजोकर रखा है। वह यादें ही मुझे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के लिए मजबूत बनाती हैं। अब मेरा बड़ा बेटा पुलिस विभाग में है, जबकि छोटा तैयारी कर रहा है।
नहीं हो सके पति के आखिरी दर्शन
गांव सैमरी, बबराला निवासी रेशमा देवी ने बताया कि पति शादी के दस वर्ष बाद सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1995 में कुपवाड़ा में तैनात थे। हर तीसरे दिन चिट्ठी आती थी। मंगलवार को व्रत रखा था और वह ड्यूटी पर चले गए थे। इसी दौरान 12 साथियों के संग बर्फबारी में दब गए थे। उसमें छह सैनिक शहीद हो गए। उस समय फोन नहीं होते थे। घटना के एक सप्ताह बाद थाने में तार आया था। करीब 15 दिन बाद सेना के अधिकारी उनके कपड़े लेकर आए थे। बर्फ में दबे होने की वजह से उनके शव को ढूंढा नहीं जा सका था। इसकी वजह से आखिरी बार पति का चेहरा भी नहीं देख सके। बड़े बेटे ने सेना को ज्वाइन किया है। मेरे तीन बच्चे हैं और मैंने अब तीनों की शादी कर दी है। इतने दिनों में एक भी दिन ऐसा नहीं गया है, जब उनकी याद नहीं आई हो।
सीने पर खाई थीं 11 गोली
गांव मिलक छावी जनपद अमरोहा निवासी चंद्रवती देवी ने बताया कि वर्ष 1991 में कारगिल के युद्ध में उनके बेटे अरविंद ने मात्र 21 वर्ष की आयु में 11 गोली सीने पर खाई थीं। युद्ध के समय बेटे की मैगजीन से गोली खत्म हो गई थीं। साथी ने उन्हें चोटी से नीचे उतरने को कहा था, लेकिन बेटे ने दुश्मन को खत्म किए बगैर नीचे उतरने से इन्कार कर दिया। इसी बीच घात लगाए बैठे दुश्मन ने अरविंद पर गोलियों की बौछार कर दी। सीने और सिर में 11 गोलियां लगी थीं। चंद्रवती ने बताया कि 13 जून को डेढ़ महीने के अवकाश के बाद ड्यूटी पर लौटे थे और 29 जून को तिरंगे में लिपटा अरविंद का पार्थिव शरीर घर आया था। बेटे ने कहा था कि शहादत के बाद उनकी खड़ी मूर्ति लगवाई जाए। उन्होंने अपने बेटे की खड़े हुए की मूर्ति लगवाकर इच्छा पूरी कर दी है।
गौरवान्वित करते हैं पिता के मेडल
फैजगंज निवासी निशात ने बताया कि उनके पिता मोहम्मद अशहाक खां राजपूताना राइफल्स में थे। उन्होंने बर्मा, बांग्लादेश, पाकिस्तान सहित चार अन्य लड़ाईयां जीती थीं। सेवानिवृत्त होने के बाद जब वह लौटे तो हमेशा वीरता की कहानी सुनाते थे। उस वक्त भले ही मोबाइल और फोन नहीं थे, लेकिन चिट्ठियों के माध्यम से हमेशा वह हमारे साथ होते थे। घर में रखे उनके मेडल आज भी गर्व कराते हैं। मेरी मां नजमा बेगम अभी जीवित हैं, लेकिन अधिक उम्र होने की वजह से वह सम्मान लेने नहीं आ सकती थीं। उनके स्थान पर सम्मान लेना बहुत ही गौरवान्वित करने वाला पल है।
शहीद गेट की मांग नहीं हुई पूरी
शिवपुरी निवासी शशिप्रभा ने बताया कि पति रामकुमार एक सितंबर 1965 में पाकिस्तान की लड़ाई में शहीद हुए थे। 11 वर्ष की आयु में मेरा विवाह हुआ था। शादी और रिश्तों के मायने भी पता नहीं थे। पति की शहादत के वक्त मेरी 16 वर्ष की उम्र थी। लड़ाई से एक महीने पहले जब वह ड्यूटी पर गए थे, तब आखिरी बार चेहरा देखा था। शहादत के बाद उनका शव घर नहीं आया था, सिर्फ कपड़े ही आए थे। सरकार और जिला प्रशासन ने उनके नाम पर स्कूल या शहीद गेट बनवाने की कई बार मांग की है, ताकि बच्चों को उनसे प्रेरणा मिल सके, लेकिन आज तक यह मांग पूरी नहीं हुई।
किराए के घर में रहने को मजबूर
अवंतिका कालोनी निवासी सावित्री देवी के पति गंगा प्रसाद वर्ष 1962 में भारत-चीन के युद्ध में शहीद हुए थे। मूलरूप से हरदोई के शाहबाद की मीरा बस्ती निवासी सावित्री देवी ने फफकते हुए बताया कि एक शहीद की विधवा होने के बावजूद उनकी जिंदगी संघर्षों में बीत गई। सरकार ने आज तक उन्हें एक घर भी नहीं दिलाया है। वह अभी भी किराए के घर में रहती हैं। उन्होंने कहा कि शादी एक वर्ष बाद ही पति शहीद हो गए थे। उनके पति के शव की जगह तिरंगा और बक्सा आया था। उन्होंने कहा कि जब-जब देश पर हमला होता है, दुख की यादें ताजा हो जाती हैं।
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